आल्हा - पाठ : केदारनाथ सिंह व नामवर जी की उपस्तिथि में

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Saturday, July 25, 2015

व्यवस्था-सुधार और सिविल सेवक (लेख)


गत वर्ष अन्‍ना हजारे के जनलोकपाल बिल के लिए किए गए आंदोलन के बाद भारत के नागरिक संगठनों तथा आम नागरिकों के बीच सरकारी संस्थाओं एवं सिविल सेवकों की जवाबदेही तथा उनके कामकाज के तौर-तरीकों के बारे में धारणा काफी तेजी से बदली है और आज जनसाधारण सरकारी तंत्र एवं सिविल सेवकों से तत्‍परता एवं जवाबदेही के  साथ समुचित रूप से सेवाएं प्रदान किए जाने तथा विकास के कार्यक्रम चलाए जाने की अपेक्षा करने लगा है। अभी हाल ही में दिल्‍ली में एक लड़की के साथ हुई बलात्‍कार की घटना एवं उसकी जघन्‍य हत्‍या के बाद पूरे देश में जिस प्रकार का जनाक्रोश पैदा हुआ और उसकी जिस प्रकार से शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक अभिव्‍यक्‍ति हुई, वह अपने आप में आँखें  खोल देने वाला है। इस स्‍वत:स्‍फूर्त एवं एक तरह से नेतृत्‍वविहीन जनांदोलन का मुख्‍य मुद्दा यही था कि हमारी पुलिस-व्‍यवस्‍था तथा नियम-निर्माणकर्ता एवं उसके परिचालन की प्रणाली किस प्रकार से जवाबदेही के साथ काम करे और समाज में व्‍याप्‍त अन्‍याय व अत्‍याचार को नियंत्रित करने के लिए किस प्रकार से कड़े कदम उठाए जांय।

            इस प्रकार के बदलते परिदृश्य में यह स्‍पष्‍ट है कि अब सिविल सेवकों को जवाबदेही के प्रचलित संवैधानिक अथवा अन्य सरकारी मंचों के अतिरिक्‍त जन-सामान्‍य अथवा सिविल-समूह के प्रति भी जवाबदेह होना पड़ेगा और उनकी अपेक्षाओं के प्रति सजग रहकर अपना कामकाज करना पड़ेगा। वैसे इस तरह की जवाबदेही की नितांत आवश्‍यकता भी थी क्‍योंकि सिविल सेवकों से जिस प्रकार की तत्‍परता एवं ईमानदारी से काम करने की उम्‍मीदें थी वे उनके केवल सरकारी तंत्र के भीतर बनी व्यवस्था के प्रति ही जवाबदेह होने से पूरी नहीं हो रही थीं और उसमें वांछित बदलाव आने तभी संभव थे, जब उन पर समाज एवं मीडिया का पर्याप्‍त दबाव हो अथवा कह लें तो जब उनकी कोई अप्रत्‍यक्ष निगरानी हो। केरल जैसा राज्‍य इस बात का उत्‍तम उदाहरण है, जहाँ सरकारी सेवकों व संस्थाओं पर विभागीय अधिकारियों अथवा मंत्रियों से ज्‍यादा दबाव रहता है,  मीडिया तथा आम जनता का जो सिविल सेवकों को समय पर सेवाएं प्रदान करने तथा साफ-सुथरे ढंग से व खुलेपन के साथ काम करने के लिए प्रेरित करती है, या कह लें तो मजबूर करती है। ऐसा नहीं है कि इस प्रकार के दबाव से अथवा गैर-सरकारी निगरानी से वहाँ भ्रष्‍टाचार समाप्‍त हो गया है लेकिन यह अवश्‍य है कि उसमें कमी जरूर आई है और यदि वहाँ भ्रष्‍टाचार के साझीदार लोगों का काम सरकारी कार्यालयों में प्रलोभन के सहारे जल्दी से हो जाता है तो इस प्रकार की सामाजिक जवाबदेही के चलते आम लोगों का काम भी बिना कुछ लिए-दिए ही सरकारी कार्यालयों में देर-सबेर से ही सही, हो ही जाता है।
            सामान्‍य तौर पर किसी भी सरकारी-तंत्र में जवाबदेही की अपनी एक व्‍यवस्‍था होती है तथा भ्रष्‍टाचार आदि को मिटाने के लिए उसका अपना एक निगरानी-तंत्र भी होता है। लेकिन तमाम स्‍तरों पर मिलीभगत के चलते यह तंत्र कई दफा निष्प्रभावी हो जाता है अथवा गैर-जवाबदेही को ही प्रोत्साहित करने लगता है। नीचे के स्तर से सरकारी सेवकों तथा विभागों के प्रशासनिक एवं राजनीतिक मुखियाओं के बीच साठगांठ से होने वाले भ्रष्‍टाचार के तमाम उदाहरण इस देश के विभिन्‍न राज्‍यों तथा केन्‍द्रीय प्रतिष्‍ठानों में हमारे सामने आते ही रहते हैं। स्‍पष्‍ट है कि जन लोकपाल जैसी निष्‍पक्ष निगरानी व्‍यवस्‍था स्‍थापित हो जाने पर इस तरह की प्रवृत्‍तियों पर कुछ अंकुश तो लगेगा ही। किन्‍तु इससे भ्रष्‍टाचार समाप्‍त हो जाएगा या व्यवस्था में पूरी तरह से जवाबदेही आ जाएगी ऐसा विश्‍वास कम ही है। लेकिन इसके विपरीत एक जागरूक जनसमूह के सामने सरकारी तंत्र निश्‍चित रूप से ज्‍यादा जिम्‍मेदारी, तत्‍परता तथा ईमानदारी के साथ काम करेगा ऐसा मेरा मानना है। ऐसे निष्‍पक्ष व सतर्क नागरिक-समूह व्यवस्था के ऊपर काफी साकारात्‍मक दबाव बना सकते हैं और आज जब ऐसा होता दिखाई दे रहा है तो यह काफी आशाएँ जगाता है। हालाँकि इस तरह के आंदोलन अभी राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कुछ बड़े मुद्दों को लेकर ही खड़े हुए हैं, जिनका प्रभाव कुछ विशेष बातों तक ही सीमित रहेगा। पूरे सरकारी तंत्र को चुस्‍त-दुरुस्‍त तथा जवाबदेही के साथ काम करने का माहौल बनाने के लिए सिविल सोसायटी तथा मीडिया में जिस प्रकार की जागरूकता की दरकार है वह अभी आना बाकी है। जब हर एक सरकारी कार्यालय के स्तर पर उससे जुड़े जन-समाज में ऐसी जागरूकता आ जाएगी, तब उच्‍च स्‍तरों पर बैठे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं अन्‍य सेवाओं से जुड़े विभागाध्‍यक्ष तथा मंत्रीगण भी समाज के प्रति अपनी जिम्‍मेदारियों व जवाबदेही को अनदेखा नहीं कर पाएंगें और तब पूरा का पूरा सरकारी-तंत्र किसी राजनीतिक पार्टी विशेष अथवा सत्‍तारूढ़ दल विशेष के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने के बजाय आम जनता के सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हुए काम करना शुरू कर देगा।

            निश्‍चित ही अब वह समय आ गया है जब सरकारी सेवकों और विशेष रूप से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को बदलती परिस्‍थितियों एवं देश के आमजनों के बीच गवर्नेंस के तौर-तरीकों के बारे में आ रही जागरूकता के मद्देनजर अपना चाल-चलन बदलना होगा और नीति-निर्धारण की प्रक्रिया में भी पारदर्शिता लानी होगी। एक समय था जब यह माना जा रहा था कि सिविल सेवकों पर जनता के नुमाइंदों की निगरानी होने से सरकारी तंत्र की सेवाएं तथा नीतियाँ जनाकांक्षाओं के अनुरूप चलती रहेंगी। इसी के चलते देश में संविधान संशोधन हुए तथा नगर निगमों व नगर पालिकाओं तथा ग्राम पंचायतों आदि के कर्तव्‍यों एवं अधिकारों को बढ़ाने के लिए व्‍यापक प्रावधान किए गए। साथ ही यह भी सुनिश्‍चित किया गया कि इन संस्‍थाओं में निर्बाध रूप से समय-समय पर चुनाव आदि होते रहें ताकि इन पर सदैव जनप्रतिनिधियों का स्‍पष्‍ट नियंत्रण रहे और सिविल सेवक तथा इनके अधिकारीगण इन अधिकारों का मनमाने ढंग से उपयोग न कर सकें। इसके अलावा जनपद व ब्लाक आदि के स्‍तर पर तमाम ऐसी समितियों के माध्‍यम से जिनमें स्‍थानीय संसद सदस्‍य व विधायक आदि शामिल किए गए, यह कोशिश की गई कि विकास के कार्यक्रमों के संचालन में भी सिविल सेवकों की जनता के नुमाइंदों के प्रति जवाबदेही बनी रहे तथा जो भी योजनाएं बने या लागू हों उनमें जनप्रतिनिधियों की भी भागीदारी हो। विधायिका तथा न्‍यायपालिका के प्रति जवाबदेही की पूर्व-स्थापित संवैधानिक व्यवस्था से एक कदम आगे बढ़कर इन सभी व्‍यवस्‍थाओं से यहीं उम्‍मीद की गई थी कि सिविल सेवकों का समूह जनप्रतिनिधियों के साथ मिल-जुलकर देश के विकास में वखूबी अपनी भागीदारी और जिम्‍मेदारी निभाएगा तथा ईमानदारी के साथ अपना काम करेगा।

लेकिन आज जो परिदृश्‍य है उसमें इस प्रकार की व्‍यवस्‍थाएं जनसामान्‍य की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रहीं। शायद इसीलिए आज सारे जन-समूह आक्रोशित होकर जगह-जगह व्‍यवस्‍था परिवर्तन की मांग उठाने लगे हैं। हालाँकि मेरे विचार में भारतीय व्‍यवस्‍था आजादी के बाद से लेकर आज तक एक सतत विकास की प्रक्रिया के दौर से गुजरी है एवं काफी सोच-समझ के बाद ही मौजूदा स्वरूप में पहुँची है और इसमें किसी आमूल-चूल परिवर्तन से ज्‍यादा जरूरी यह है कि इस व्‍यवस्‍था में जवाबदेही का कुछ नया तंत्र विकसित हो और इसका कामकाज सुधरे। एक तरफ तो इस तरह की नई जवाबदेही की प्रणाली का विकास जनलोकपाल अधिनियम, सेवा गारंटी अधिनियम, जन शिकायत निवारण अधिनियम आदि कानूनों के बनने से स्‍थापित होगी ही, वहीं दूसरी तरफ जिस प्रकार की जागरूकता आज सामान्‍य जन-समूह के बीच उभरती दिखाई दे रही है उससे सिविल सेवकों में इन सब कानूनी व्यवस्थाओं से भी ज्यादा सक्षम रूप से जवाबदेही आएगी। हालाँकि इसके लिए सिविल सेवकों को सामान्‍य जनसमूह की भावनाओं का आदर करते हुए और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था का जो वास्‍तविक उद्देश्‍य है इसको पहचानते हुए अपने कार्य-व्यवहार में समुचित परिवर्तन लाना होगा और तदनुसार जिम्मेदारी के साथ अपना कामकाज करना होगा।
            स्‍वतंत्रता-प्राप्‍ति के बाद 10 अक्‍तूबर, 1949 को भारत की संविधान सभा में बोलते हुए सरदार वल्‍लभ भाई पटेल ने कहा था कि यदि आप एक कुशल अखिल भारतीय सेवा चाहते हैं तो मेरी आपको सलाह है कि आप उन्‍हें मुंह खोलने का मौका दें। यदि आप मुखिया हैं तो आपकी यह जिम्‍मेदारी होगी कि आप अपने सचिव, मुख्‍य सचिव या अपने अधीनस्‍थ कार्य करने वाले अन्‍य सेवाओं के सदस्‍यों को, बिना भय या पक्षपात के, अपना मन्‍तव्‍य व्‍यक्‍त करने की अनुमति दें। लेकिन मैं पाता हूँ कि अनेक प्रान्तों में सेवाओं को गठित करके उनसे कहा जा रहा है, नहीं, आप सेवक है, आपको सिर्फ हमारे आदेशों का अनुपालन करना है। यदि आप एक ऐसी अच्‍छी अखिल भारतीय सेवा नहीं रखेंगे जो अपने विचारों को स्‍वतंत्र रूप से व्‍यक्‍त कर सकें तथा जिसको यह भरोसा हो कि वह सुरक्षित है और आप अपने वायदों पर कायम नहीं रहेंगे तो यह संघ समाप्‍त हो जाएगा और आप भारत को अखण्‍ड नहीं रख सकेंगे। सरदार पटेल के इस वक्‍तव्‍य के अनुरूप सिविल सेवकों को विशेष रूप से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को निष्‍पक्ष व मुखर होकर अपना कामकाज करना चाहिए। लेकिन इस प्रकार के दायित्‍व-निर्वहन का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि वे स्‍वेच्‍छाचारी हों और जैसा चाहें वैसा करें। निश्‍चित  रूप से उन्‍हें जनसामान्‍य की अपेक्षाओं के प्रति सजग रहकर तथा सरकारी-व्यवस्था एवं सामान्‍य जनों की निगरानी के अधीन रहकर ही अपना काम-काज जवाबदेही के साथ करना होगा तभी इस देश का भला होगा।

जब सरदार वल्‍लभ भाई पटेल ने ऐसा कहा था कि तो उन्‍होंने उसी के साथ यह भी कहा था, - जब देश में स्‍थिरता आ जाएगी और यह मजबूत हो जाएगा, तब आप जैसा भी परिवर्तन करना चाहेंगे, उसके लिए सेवा के लोगों को तैयार करना मुश्‍किल नहीं होगा। जब रजवाड़ों को उनके राज्‍य सौंपने के लिए मना लिया गया तो सेवा के लोगों के साथ क्‍या दिक्‍कत होगी? वे अपने लोग हैं, उनके बच्‍चे भी हमारे साथ काम करेंगे। उन्‍होंने रात-दिन देश के लिए परिश्रम किया है। यह वे लोग हैं जो आत्‍म सम्‍मान, इज्‍जत व शोहरत की चिंता करते हैं और हमारे स्‍नेह के हकदार हैं। ऐसे विरले लोग होंगे जो दुश्मन की तरह माने जाने के बावजूद देश की सेवा करना चाहेंगे। आज जब चारों तरफ से व्‍यवस्‍था परिवर्तन की बात उठ रही हैं तो सरदार वल्‍लभ भाई पटेल की ये बातें बहुत ही समीचीन हो जाती है। जो लोग व्‍यवस्‍था-परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनको यह समझना होगा कि भले ही सिविल सेवक पूरी अपेक्षा के अनुरूप जनता की सेवा न कर रहे हों तथा देश के विकास में अपना पूरा योगदान नहीं दे रहे हों फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो वे जनता व देश के लिए कर रहे हैं। ये न तो इस देश में बाहर से आए हैं, न ही इस देश अथवा इसके आम नागरिकों के प्रति विद्वेष रखते हैं और न ही ये देशद्रोही हैं। अतः आज सिविल सेवाओं की उपस्‍थिति को संज्ञान में लेते हुए तथा उनके योगदान को स्वीकारते हुए आज सिविल-समूह तथा मीडिया को उनपर बेहतर जिम्‍मेदारी व जवाबदेही के साथ काम करने का दबाव बनाना होगा और स्थापित व्‍यवस्‍था को उखाड़ फेंकने के बजाय उसे सुधारने का लक्ष्‍य सामने रखकर काम करना होगा। इसी के साथ ही सिविल सेवा के सदस्‍यों को भी सिविल समूहों के साथ हाथ मिलाकर देश की व्‍यवस्‍था सुधारने तथा प्रशासनिक व राजनीतिक दोनों स्‍तरों पर एक सजग एवं कुशल तथा जवाबदेह सरकारी-तंत्र स्‍थापित करने की मुहिम में भागीदारी करनी होगी।   

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