आल्हा - पाठ : केदारनाथ सिंह व नामवर जी की उपस्तिथि में

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Saturday, October 25, 2014

नरेश सक्सेना की 'गिरना' कविता में जीवन-दर्शन (लेख)

नरेश सक्सेना की 'गिरना' कविता सम्यक रूप से जीवन-दर्शन को प्रतिपादित करने वाली एक कविता है। मेरे विचार में यह कविता इक्कीसवीं सदी की संक्षिप्त मानव-गीता है। पंक्ति दर पंक्ति मनुष्य व मनुष्यता के पतन का आकलन करती तथा इस पतन की प्रवृत्ति के ऐतिहासिक एवं समसामयिक पहलुओं का विश्लेषण करती यह कविता मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। मानवता का यह पतन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों, राजनीतिक परिवर्तनों, आर्थिक संसाधनों व शक्तियों जुटाने के मार्ग में आ रहे परिवर्तनों से जुड़ा है, लेकिन यह कविता पतन के कारणों की तरफ नहीं देखती। यह पतन की व्याप्ति की ओर देखती है। यह प्राकृतिक बिम्बों के सहारे इस पतन के दोषकारी परिणामों से बचने का रास्ता तलाशती है। परहित को जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य बनाने का आह्वान करती है। जैसे प्रकृति में वस्तुओं का गिरना एक अनिवार्य प्रक्रिया है, वैसे ही मनुष्य-जीवन में भी गिरने से नहीं बचा जा सकता, बस मनुष्य के गिरने की दिशा, उसका लक्ष्य और उसका परिणाम बदला जा सकता है। इस प्रकार नष्टप्रद जीवन को लोकहित का निमित्त बनाया जा सकता है। जैसे प्रकृति में अलग-अलग संदर्भों में गिरने के भिन्न-भिन्न परिणाम होते हैं वैसे ही मनुष्य-जीवन में भी। अनेक संदर्भों में पतन भी सुखद परिणाम देने वाला होता है। यह कविता जीवन की पतनोन्मुख गति को ऐसे ही सुखद परिणाम देने वाली किसी दिशा में मोड़ देने का संदेश देती है। जरूरत पड़ने पर यह दिशा उल्कापात या वज्रपात जैसी विनाशक भी हो सकती है, क्योंकि कभी-कभी ऐसा विनाश ही लोक-कल्याण का एकमात्र विकल्प होता है। नरेश सक्सेना इस कविता में गिरने की दशाओं और उनकी परिणतियों का विश्लेषण करते हुए उसे लोक-कल्याण का निमित्त और मानवता का अहित करने वाले शत्रु को ध्वस्त कर देने वाला क्रांतिकारी उपक्रम बना देने का आह्वान करते हैं।
           
            इस कविता में उल्लिखित पतन 'भगवत-गीता' के 'न तु मामभिज्ञानन्ति तत्वेनातश्च्यवन्ति ते' (जो मुझे नहीं जानते हैं वे वास्तव में गिर जाते हैं) में इंगित अथवा तुलसीदास जी की 'रामचरितमानस' के उत्तर काण्ड में वर्णित धार्मिक या सामाजिक पतन जैसा नहीं है। यहाँ एक तरफ नैतिक पतन है तो दूसरी तरफ प्रकृति में निरन्तर घटित होने वाला वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित नैसर्गिक पतन है। यहाँ एक तरफ भौतिक पतन है तो दूसरी तरफ मनुष्य के भीतर समानान्तर रूप से जारी रहने वाला बुद्धि, विवेक, साहस एवं सोच में हो रहा आन्तरिक पतन है। कविता की शुरुआत ही इन दोनों ही प्रकार के पतन की प्रवृत्तियों की तुलना के साथ होती है:

'चीज़ों के गिरने के नियम होते हैं!
मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते
लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में
मनुष्य कर सकते हैं'

            मनुष्य का नैतिक पतन पैदा होने के साथ ही शुरू हो जाता है। बचपन से ही वह दोहरे आचरण के लिए प्रेरित किया जाता है। माता-पिता व समाज ही उसे दोहरे आचरण की सीख देते हैं। 'बचपन से ही ऐसी नसीहतें मिलती रहीं/ कि गिरना हो तो घर में गिरो/ बाहर मत गिरो' कहकर नरेश सक्सेना यह दोहरा आचरण करने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है यह स्पष्ट कर देते हैं।  आगे की पंक्तियों में वे बड़े ही रोचक ढंग से इस दोहरे आचरण की प्रवृत्ति का अवलोकन करते हैं, - 'यानी चिट्ठी में गिरो/ लिफ़ाफ़े में बचे रहो, यानी/ आँखों में गिरो/ चश्में में बचे रहो, यानी/ शब्दों में बचे रहो/ अर्थों में गिरो' कहकर वे मनुष्य के बाहरी और भीतरी आचरण में अन्तर होने की प्रवृत्ति को नंगा कर देते हैं। मनुष्य अपने भीतर हो रहे पतन को छिपाना चाहता है। वह उसे दुनिया की नज़रों में नहीं लाना चाहता। बाहर से लौह-कवच, भीतर से पिलपिला। बाहर से सदाचारी, अन्दर से कमीना। यानी हाथी के दाँत, खाने के और, दिखाने के और। आज जब हम पलटकर अपने चारों तरफ देखते हैं तो हमें पूरे समाज में ऐसा ही होता नज़र आता है। राजनेता, अफ़सर, धर्मगुरू, नियम-परिपालक सबका आचरण ऐसा ही है, दिन में कुछ और, रात में कुछ और। बाहर कुछ और, घर में कुछ और। आज दुनिया की समस्या ही दोहरा आचरण है, भारत में बिशेषकर। यदि आचरण का यह भेद मिट जाए तो दुनिया से अच्छे-बुरे की पहचान का संकट ही मिट जाय और पतन का सिलसिला भी रुक जाय। यह पतन इसीलिए नहीं रुक रहा क्यों कि यह आड़ में घटित होता है और इसे भरसक छिपाया जाता है। इसके वास्तविक रूप को आँखे नहीं देख सकती, क्योंकि चश्में में इसका असली अक़्स नहीं उभरता। इसके ख़त के मज़मून को लिफ़ाफ़ा देखकर भाँप पाना मुश्किल है क्योंकि यह ख़त  के भीतर ही भीतर घटित होता है। यह शब्दों के आवरण के पीछे छिपे अर्थों के बीच घटित होता है। यहाँ गुरु द्रोण को 'अश्वत्थामा हतो' तो सुनने दिया जाता है, किन्तु 'नरो वा कुंजरो' को शंखनाद की जरिये छिपा दिया जाता है। कथाकार अखिलेश के शब्दों में 'यह समकालीन मनुष्य की कायरता और उसकी आत्मा के अन्त का प्रसंग' है।

            नरेश सक्सेना इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि मनुष्य का पतन इसी अहसास के साथ शुरू होता है कि कभी-कभी थोड़ा-सा गिर जाना कोई बड़ी बात नहीं होती। वह सोचता है कि थोड़ा-सा गिरकर भी सँभला जा सकता है। न भी सँभले तो थोड़ा-सा गिरने से उसका या समाज का कुछ नहीं बिगड़ेगा। बस इसी सोच से गिरने का यह अंतहीन सिलसिला शुरू होता है -

'यही सोचकर गिरा भीतर
कि औसत कद का मैं
साढ़े पाँच फीट से ज्यादा क्या गिरूँगा
लेकिन कितनी ऊँचाई थी वह
कि गिरना मेरा ख़त्म ही नहीं हो रहा'

            अब देखिए न कि हमारा समाज कैसे इसी तरह की छोटी-छोटी गिरावटों के चलते एक ऐसे अध:पतन का शिकार हो चुका है, जिसमें से उठकर बाहर निकलने का रास्ता ही नज़र नहीं आता। सरकारी कार्यालयों में भ्रष्ट चपरासी सौ रुपए घूस लेता है, भ्रष्ट क्लर्क हज़ारों में, भ्रष्ट अफसर लाखों में और भ्रष्ट मंत्री करोड़ों में। क्या सैकड़ों में घूस लेने वाला नैतिक पतन की दृष्टि से बड़े घूसखोरों से भिन्न है? नहीं यह सिर्फ गिरने का त्वरण है। पतन का प्रारम्भ वहीं से होता है, जहाँ किसी गिरावट को जरा-सा, हल्का-सा, अस्थायी या गैर-महत्वपूर्ण मानकर उसे जगह दे दी जाती है। मनुष्यों के इस तरह गिरने को देखकर ही पता चलता है कि जो ऐसे माहौल में भी नहीं गिरा है उसका कद कितना ऊँचा है।

            'गिरना' कविता में भी नरेश सक्सेना अपने विज्ञानवेत्ता स्वभाव को सामने लाकर चीज़ों के गिरने की प्रक्रिया के भौतिक-शास्त्रीय सिद्धान्त की खोज, उसकी स्थापना तथा उसके व्यतिचलित होने के इतिहास की सूक्ष्म विवेचना करते हैं, - 'चीज़ों के गिरने की असलियत का पर्दाफाश हुआ/ सत्रहवीं शताब्दी के मध्य/ जहाँ पीसा की आखिरी सीढ़ी चढ़ता है गैलीलियो, और चिल्लाकर कहता है - / "इटली के लोगों, अरस्तू का कथन है कि भारी चीज़ें तेजी से गिरती हैं/ और हल्की चीज़ें धीरे-धीरे/ लेकिन अभी आप अरस्तू के इस सिद्धान्त को ही/ गिरता हुआ देखेंगे/ गिरते हुए देखेंगे लोहे के भारी गोलों/ और चिड़ियों के हल्के पंखों और काग़ज़ों को/ एक साथ, एक गति से/ गिरते हुए देखेंगे/ लेकिन सावधान/ हमें इन्हें हवा के हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा,"/ और फिर ऐसा उसने कर दिखाया' । उस वक़्त गैलीलियो ने जो किया वह तो विज्ञान के सिद्धान्तों पर ही आधारित था। वह व्यतिचलन वस्तुओं के गिरने पर लागू हो सकता था। उसके मनुष्यों के पतन पर भी लागू होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। फिर भी बदकिस्मती से आज हालात यही हैं कि चीज़ों के गिरने पर लागू होने वाले गैलीलियो के वे सिद्धान्त आज मनुष्यों के गिरने के सम्बन्ध में भी लागू हो गए हैं और आज सभी लोग गिर रहे हैं। सर्वस्व खोते हुए वे एक साथ, एक ही गति से पतन की ओर अग्रसर हैं -

'और लोग
हर कद और हर वज़न के लोग
यानी हम लोग और तुम लोग
एक साथ, एक गति से
एक ही दिशा में गिरते नज़र आ रहे हैं।'

            आज के मानव-समाज में पतन के इस सिलसिले को रोकना संभव नहीं है। पतन तो नैसर्गिक होता है, शाश्वत होता है। बस उसकी दिशा बदली जा सकती है। उसका उद्देश्य बदला जा सकता है। उसका तरीका बदला जा सकता है। ऐसा बदलाव होने से पतन के परिणाम बदल जाते हैं। समाज में हो रहे विनाशकारी परिवर्तनों को कल्याणकारी परिवर्तनों में बदला जा सकता है। अपने भीतर की सोच में इस तरह का बदलाव लाने के लिए हमें गहराई से विचार करना होगा। नरेश सक्सेना प्रकृति में चारों तरफ चल रही गिरने की प्रक्रियाओं एवं उनके परिणामों को गौर से देखने तथा उससे सीख लेकर अपना रास्ता चुनने की सलाह देते हैं -

'इसीलिए कहता हूँ कि ग़ौर से देखो, अपने चारों तरफ
चीज़ों का गिरना
और गिरो
गिरो जैसे गिरती है बर्फ़
ऊँची चोटियों पर
जहाँ से फूटती हैं मीठे पानी की नदियाँ।'

            अपनी बात कहते-कहते जब तक कवि रौ में न आए, तब तक कविता दमदार नहीं होती। पारम्परिक भक्ति, श्रंगार व वीर रस के कवियों के काल में भी उनके द्वारा अपनी अभिव्यक्त की पूरी रौ में आकर अद्भुत काव्य-प्रभाव सृजित करने का यह सिलसिला दिखाई पड़ता है। नरेश सक्सेना जब 'गिरना' कविता में अपने उत्कृष्ट आधुनिकता-बोध के साथ पूरी रौ में आते हैं तो उनकी पंक्तियाँ चमत्कारिक प्रभाव पैदा करने लगती हैं -

'गिरो प्यासे हलक में एक घूँट जल की तरह
रीते पात्र में पानी की तरह गिरो
उसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए
गिरो आँसू की एक बूँद की तरह
किसी के दु:ख में
गेंद की तरह गिरो
खेलते बच्चों के बीच'

            यहाँ नरेश सक्सेना की बातों में, माँग के आधार पर होने वाली आपूर्ति ही बेहतर होती है, ऐसे सर्वमान्य अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त की पुष्टि होती-सी दिखाई पड़ती है। जल की बूँद यदि कहीं और गिरती है तो वह व्यर्थ चली जाती है। जब वह किसी प्यास से बेहाल गले को तर करती है, तभी सार्थक होती है। पानी यदि किसी भरे हुए पात्र में गिरता है तो न ही उसके गिरने की आवाज़ में संगीत की तरह का कोई आरोह-अवरोह होता है और न ही वह उस पात्र में टिकता है। उसकी सार्थकता किसी खाली बर्तन में गिरने पर ही है। तभी उसके गिरने की आवाज़ में संगीतात्मकता पैदा होती है और आरोह व अवरोह से भरा एक आकर्षण पैदा होता है। करुणा का प्रवाह भी तभी सार्थक होता है जब वह किसी के दु:ख में शामिल होने के लिए होता है, किसी दुखियारे के साथ सहानुभूति प्रकट करने के लिए होता है। व्यर्थ में आँसू बहाने की कोई सार्थकता नहीं होती। खुशी भी असमय आए तो बेकार चली जाती है। उसकी अनुभूति तभी तीव्रतम होती है जब वह आनन्द की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील लोगों के बीच जा टपकती है, जैसे खेलते हुए बच्चों के बीच कोई गेंद जा टपके। इस प्रकार इन पंक्तियों में नरेश सक्सेना मनुष्य के आस-पास के परिवेश से ही कुछ ऐसे चित्र खींचकर हमारे सामने रख देते हैं जो यह स्पष्ट कर देते हैं कि किसी चीज़ की सार्थकता इसमें नहीं होती कि वह हमारे सामने मौजूद है या हमारे लिए सुलभ है। उसकी सार्थकता तभी होती है, जब वह सही ढंग से हो, सही जगह पहुँचे और किसी जरूरतमंद की आवश्यकता को पूरा करे, उसे सान्त्वना दे, उसे आश्वस्त करे। यहाँ खालीपन को भरे जाने की बात है। असुन्दर को सुन्दर बनाने की बात है। माँग के अनुकूल आपूर्ति का निमित्त बनने की बात है। गिरकर स्वयं को मिटाते हुए भी किसी जरूरतमंद को आश्वस्ति से भर देने की बात है।

            कविता जितना ही नैसर्गिकता के नज़दीक जाती है, उतना ही मानव-मन की संवेदनाओं के नज़दीक पहुँचती है। प्रकृति के सहज बिम्बों से वह शब्दों के सहारे जीवन की उन घटनाओं व अनुभूतियों के चित्र खींचती है, जिन्हें हम सामान्यत: देखते हुए भी अनदेखा कर देते हैं, महसूसते हुए भी महसूस नहीं करते और इस प्रकार हम सृष्टि का एक विशिष्ट अवदान बनने से चूक जाते हैं। नरेश सक्सेना 'गिरना' में कुछ ऐसे ही एक नैसर्गिक बिम्ब का सहारा लेते हुए अपनी इन पंक्तियों में कुछ वैसा ही विश्व-संदेश देने की कोशिश करते हैं, जैसा 'भगवतगीता' में 'जीर्णानि वस्त्राणि यथा बिहाय' कहकर श्रीकृष्ण देते हैं -

'गिरो पतझर की पहली पत्ती की तरह
एक कोपल के लिए जगह खाली करते हुए
गाते हुए ॠतुओं का गीत
"कि जहाँ पत्तियाँ नहीं झरतीं
वहाँ वसन्त नहीं आता"

            नरेश सक्सेना की कई कविताओं में मनुष्य की संघर्षशीलता की प्रवृत्ति का निरूपण करने के लिए ईंटों की प्रवृत्ति को बिम्बात्मक रूप में इस्तेमाल किया गया है। ऐसा शायद इसलिए हुआ है कि वे पेशे से इंजीनियर रहे हैं और ईंट-गारे के काम से जुड़े रहे हैं।  उनके कविता-संग्रह समुद्र पर हो रही है बारिश में ईंटें शीर्षक एक कविता है जो लम्बे समय से  हिन्दी की सर्वाधिक चर्चित रही कविताओं में से एक है। उनके हालिया कविता-संग्रह सुनो चारुशीला की ईंटें-2 कविता भी मनुष्य की संघर्षशीलता से ईंटों के इस जुड़ाव को और ज्यादा गहराई से प्रतिपादित करती है। भिन्न-भिन्न प्रकार की ईंटों के निर्माण की प्रक्रिया व उनके अलग-अलग प्रकार के उपयोगों को आधार बनाकर जिस तरह से नरेश सक्सेना ने मनुष्य-समूह को संघर्ष की तैयारी के लिए एक रास्ता सुझाया है वह चकित कर देने वाला एवं प्रभावशाली है। 'गिरना' कविता में भी ईंटों का जिक्र है। ईंटो के नींव में गिरने से ही किसी का घर बनता है, अत: मनुष्य को ईंटों के नींव में गिरने की तरह ही गिरना चाहिए कहकर वे उन्हें एक मजबूत समाज की संरचना के लिए खुद को मिटा देने की पहल करने के लिए तैयार रहने का आह्वान करते हैं -

'गिरो पहली ईंट की तरह नींव में
किसी का घर बनाते हुए'

            जब तक किसी कविता में आधुनिकता का बोध न हो, नई चेतना का विस्तार न हो, नए उद्देश्य-लक्ष्यों का प्रतिपादन न हो, तब तक वह कविता इक्कीसवीं सदी की मानव-गीता कैसे बन सकती है? 'गिरना' में मुझे यह सब कुछ समाविष्ट दिखता है, इसीलिए मैंने इसे इक्कीसवीं सदी की मानव-गीता कहा है। इस कविता की नीचे दी गई पंक्तियों में नरेश सक्सेना के आधुनिकता-बोध का उद्दीपन हुआ है, या यह कहें कि इनमें उनकी बृहत्तर किन्तु सूक्ष्मदर्शी व सूक्ष्मस्पर्शी काव्य-दृष्टि का निरूपण हुआ है, या फिर यह कह लें कि इनमें उनकी सर्व-कल्याणकारी काव्य-चेतना का विस्फोट हुआ है:

'गिरो जलप्रपात की तरह
टरबाइन के पंखे घुमाते हुए
अंधेरे पर रोशनी की तरह गिरो
गिरो नीली हवाओं पर धूप की तरह
इन्द्रधनुष रचते हुए
लेकिन रुको
आज तक सिर्फ़ इन्द्रधनुष ही रचे गए हैं
उसका कोई तीर नहीं रचा गया
तो गिरो उससे छूटे तीर की तरह
बंजर ज़मीन को
वनस्पतियों और फूलों से रंगीन बनाते हुए'

            यहाँ जलप्रपात का किसी सुरम्य घाटी के सीने पर गिरने की अपेक्षा टरबाइन के पंखों पर गिरना ज्यादा अभिकाम्य माना गया है। इस प्रकार गिरने पर ही उसकी ऊर्जा से बिजली बन सकती है और उस बिजली के उपयोग से अँधेरे में भी रोशनी फैलाई जा सकती है। इसी से दुनिया को प्रकाशमान किया जा सकता है। यहाँ अँधेरे पर रोशनी की तरह गिरने का आह्वान है। यहाँ कवियों द्वारा मिथकीय संसार में रचा जाने वाला इन्द्रधनुष न होकर  वैज्ञानिक आधार पर गीली हवाओं पर धूप के पड़ने से रचा जाने वाला इन्द्रधनुष है। यह इन्द्रधनुष किसी दैवी शक्ति का अहसास कराने वाली संरचना न होकर, प्रकृति में सहज रूप से प्रकट होने वाली एक सुन्दर आकृति है। नरेश सक्सेना एक विचारशील कवि के रूप में इस सुन्दर प्राकृतिक विधान का जिक्र बस गीली हवाओं पर धूप के गिरने की घटना की महत्ता की ओर इंगित करने के लिए ही नहीं करते, बल्कि वे साहित्य के अतीत की इस विडंबना की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि अभी तक कवियों ने हर जगह केवल इन्द्रधनुष का ही वर्णन किया है, उसके तीरों का कहीं कोई जिक्र नहीं किया है। अर्थात अतीत के कवियों ने सिर्फ काल्पनिक वर्णन पर ही ध्यान केन्द्रित किया है, मिथकीय कथानक रचे हैं, प्राकृतिक सौन्दर्य का रसास्वादन कराया है किन्तु प्रकृति या मनुष्य-जीवन के वास्तविक युद्ध या संघर्ष को देखने की कोई कोशिश नहीं की है। नरेश सक्सेना ऐसे इन्द्रधनुष से निकले, अभी तक अनदेखे रह गए तीर को जीवन-संघर्ष में विजय प्राप्त करने का निमित्त बनाने की संकल्पना करते हैं। उनका इन्द्रधनुष वह मिथकीय इन्द्रधनुष नहीं है जो तीर नहीं छोड़ता था या शायद फूलों के तीर छोड़ता था। उनका इन्द्रधनुष करुणा से आर्द्र हवाओं पर चेतना का तीव्र प्रकाश पड़ने से मन के क्षितिज पर सतरंगी हो उठने वाली उम्मीदों का धनुष है जो अभाव को, निराशा को, वंचना को दूर करने वाले तीर चलाकर दुनिया को खुशहाल बना सकता है। नरेश सक्सेना लोगों से इस नैसर्गिक इन्द्रधनुष से छूटकर चारों तरफ अनुर्वर व निष्प्रयोज्य पड़ी सृष्टि को पुनर्जीवित करने वाले किसी तीर की तरह गिरने का आह्वान करते हैं। 
 
            प्रकृति में गिरने की तमाम प्रवृत्तियाँ पुनर्सृष्टि का निमित्त बनती हैं। गिरने का सामान्य अर्थ नष्ट हो जाना होता है। पतन का अर्थ नीचता की ओर ले जाने वाली प्रवृत्ति ही लगाया जाता है। लेकिन प्रकृति में गिरना एक नैसर्गिक प्रक्रिया होती है, जो हमेशा पतन का या नष्ट हो जाने का निमित्त नहीं बनती। प्रकृति में कई संदर्भों में गिरना पुनर्जीवन का निमित्त बनता है अथवा पुनर्सृष्टि के लिए अनिवार्य होता है। यह 'बाइबिल' के सुप्रसिद्ध 'मानवता के पतन' की तरह है जहाँ मायारूपी सर्प हव्वा के भीतर लोभ का संचार करता है और विकारग्रस्त हव्वा व आदम निषिद्ध फल को खाकर रतिग्रस्त हो पतन की ओर अग्रसर हो जाते हैं, लेकिन उनका वह मौलिक पाप ही मानव-जाति की निरंतरता का निमित्त बन जाता है। नरेश सक्सेना गिरने के अनेक प्राकृतिक संदर्भों के सहारे एक व्यापक जीवन-दर्शन का प्रतिपादन करते हैं और अपनी इन पंक्तियों में वे मनुष्य से इसी जीवन-दर्शन को आत्मसात करने का आह्वान करते हैं:

'बारिश की तरह गिरो, सूखी धरती पर
पके हुए फल की तरह
धरती को अपने बीज सौंपते हुए, गिरो'

            मनुष्य का शरीर नश्वर होता है। उसका एक-एक अंग धीरे-धीरे शिथिल होता जाता है, नष्ट होता चला जाता है। स्मृति का लोप होने लगता है। ऊर्जा क्षीण होने लगती है। इसका वर्णन कोई नई बात नहीं है। किन्तु नरेश सक्सेना की इन पंक्तियों में मनुष्य के शरीर की नश्वरता को बताने का तरीका एकदम नया लगता है। यहाँ शरीर के नाश की ओर अग्रसर होने की प्रक्रिया किसी भावुकतापूर्ण या नैसर्गिक वंचना की अभिव्यक्ति का अहसास नहीं कराती, बल्कि यह जीवन के उस यथार्थ का अहसास कराती है जो नितान्त वैज्ञानिक है एवं स्वाभाविक है:

'गिए गए बाल
दाँत गिर गए
गिर गई नज़र और
स्मृतियों के खोखल से गिरते चले जा रहे हैं
नाम, तारीखें और शहर और चेहरे …
और रक्तचाप गिर रहा है देह का
तापमान गिर रहा है
गिर रही है ख़ून में मिकदार हीमोग्लोबिन की'

            अन्याय व अत्याचार के खिलाफ समय-समय पर प्रतिरोध व क्रान्ति का परचम लहराया जाता रहा है। 'गिरना' के अंतिम चरण में नरेश सक्सेना मनुष्य को उसके इसी कर्त्तव्य का ध्यान दिलाते हैं। शरीर का अंत तो निश्चित है। अत: निष्क्रिय बैठे रहकर उस अंत को प्राप्त हो जाने का कोई मतलब नहीं। खेत में रखवाली करने के लिए किसान द्वारा खड़े किए गए बिजूका की तरह केवल अपनी आकृति का अहसास कराते रहने से कुछ नहीं होने वाला, कोई बदलाव नहीं आने वाला। उससे पैदा होने वाला भय या प्रतिरोध तात्कालिक ही होता है। निष्क्रिय शरीर भी बिजूका की तरह ही होता है। तो जब शरीर को नष्ट होना ही है तो उसे बिजूका की तरह गिरकर चुपचाप नष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उसे कुछ करके ही मिटना चाहिए। इसके लिए उसे अपना लक्ष्य सही ढंग से निर्धारित करना चाहिए। दुश्मन की ठीक से पहचान करनी चाहिए। उसे दुश्मन से अंत तक संघर्ष करना चाहिए। यह संघर्ष ऐसा होना चाहिए कि जिसमें मनुष्य स्वयं नष्ट हो तो हो, लेकिन शत्रु को नष्ट करके ही माने। नरेश सक्सेना इस कविता के अंतिम चरण में कुछ इसी प्रकार के अंत का वरण करने का आह्वान करते हैं:

'खड़े क्या हो बिजूके से नरेश,
इसके पहले कि गिर जाये समूचा वजुद
एकबारगी तय करो अपना गिरना
अपने गिरने की सही वजह और वक़्त
और गिरो किसी दुश्मन पर
गाज की तरह गिरो
उल्कापात की तरह गिरो
वज्रपात की तरह गिरो
मैं कहता हूँ, गिरो'

            यह ठीक उसी तरह है जैसे 'महाभारत' में 'उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा शेष्वैवं पराजितः' (हे कापुरुष, उठो, इस प्रकार परास्त होकर मत सो जाओ) कहकर मनुष्य को झकझोरा गया है। यह गिरते-गिरते भी अपनी कद-काठी सँभाल लेने और तनकर खड़े हो जाने के लिए प्रेरित करने वाली कविता है। यह केदारनाथ अग्रवाल की 'जहाँ गिरा मैं/ कविताओं ने मुझे उठाया' जैसी गिर रहे लोगों को उठाकर खड़ा कर देने वाली कविता है। यह प्रेमचन्द के विचारों के अनुरूप 'जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं' वैसे अच्छे साहित्य की प्रतिनिधि कविता है। 'गिरना' में प्रतिपादित जीवन-दर्शन का निचोड़ यही है कि दुनिया में सभी कुछ परिवर्तनशील है, नश्वर है और इसी परिवर्तनशीलता ने ही प्रकृति के नए-नए रूपों को जन्म दिया है। यही परिवर्तन जीव-जगत के विकास तथा मनुष्य जैसे विशिष्ट जीव के सृजन का निमित्त बनता है, जैसा कि हमारी इस धरती पर हुआ है। यह परिवर्तन, किसी एक भू-भाग के ही नहीं, गृहों, सौर-मंडलों, आकाश-गंगाओं तक के विलुप्त हो जाने का कारण बनता है। अनिवार्य रूप से नष्ट हो जाने वाली प्राकृतिक चीजें जाते-जाते भी अभिनव पुनर्संरचना की आधारशिला रख जाती हैं। नश्वरता का यही स्वरूप कल्याणकारी होता है। मानव-समाज को भी निरन्तर ऐसी ही पुनर्संरचना की आवश्यकता होती है। नरेश सक्सेना पेशे से निर्देशक भी हैं और वे अपनी कविता के माध्यम से यही निर्देशित करते हैं कि मनुष्य का गिरना या नष्ट होना समाज में उल्लास एवं चेतना के पुनर्संचार तथा शोषण व अत्याचार के विनाश का कारक बनना चाहिए ताकि दुनिया से मानवता न नष्ट हो, सर्जनात्मकता न नष्ट हो, प्रतिरोधात्मकता न नष्ट हो। 

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