आल्हा - पाठ : केदारनाथ सिंह व नामवर जी की उपस्तिथि में

आल्हा - पाठ : केदारनाथ सिंह व नामवर जी की उपस्तिथि में

Monday, October 12, 2015

प्रतिबद्धता

प्रातःभ्रमण पर निकले वृद्ध दम्पति
प्रथमदृष्ट्या रहे होंगे अस्सी के पार
कदमताल करने की उनकी शारीरिक अशक्तता
किन्तु पारस्परिक मनस्थ लयशीलता
साफ़ - साफ़ दिख रही है चाल में
आजीवन प्रेम करने की प्रतिबद्धता
ऐसी असंदिग्ध कि मात कर दे युवाओं को भी

चलते - चलते अचानक ही एक खुशबू मारती है टिहुनी
राह के किनारे बिछी हरसिंगार के फूलों की चादर रोकती है राह
वृद्ध चलता रहता है मंदस्मित
वृद्धा ठिठुक कर झुकती है और भरने लगती है
हरसिंगार के फूलों को कोंछे में
मुझे लगा जैसे एकाएक ही वापस पहुँच गई हो वह
अपने यौवन की दहलीज़ पर
जहाँ बीना करती थी वह प्रणय के मोती
जीवन में सुख का संसार सजाए रखने के लिए

वृद्धा इस अवस्था में भी सिद्ध कर रही है
कि स्त्री हमेशा ही सँजोती है सपनों को
बीन - बीनकर भरती रहती है
राह में बिखरी खुशियों को कोंछे में
जीवन में किसी भी बेमुरव्वत वक़्त का सामना करने के लिए

स्त्री कभी नहीं करती पुरुष की तरह
जीवन की कठिन डगर में बिखरे हुए
किसी भी सुपरिचित गंध - स्पर्श को नज़रंदाज।

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