आल्हा - पाठ : केदारनाथ सिंह व नामवर जी की उपस्तिथि में

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Sunday, January 15, 2012

अनहोनी

किसी अनहोनी की आशंका
हर तरह की होनी से अधिक बेचैन करती है।

होनी आती है अक्सर
अपने तयशुदा वक़्त पर
खुशियों का प्रतीक बनकर
हँसने-मुसकराने अथवा
ठहाके लगाने के तमाम अवसर पैदा करती हुई,
या फिर कभी-कभी
पीड़ा एवं अवसाद की चुभन बनकर
सीने पर दुःखों एवं तकलीफों के पहाड़ जमाती हुई।

अनहोनी के आने का
कोई वक़्त या ठिकाना नहीं होता
पहले से कुछ पता नहीं होता कि वह कब आएगी,
वह तो बस बिजली की तरह
कड़ककर आ गिरती है सिर पर अचानक
आस-पास सभी कुछ
तहस-नहस सा करती हुई पल भर में।

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