आल्हा - पाठ : केदारनाथ सिंह व नामवर जी की उपस्तिथि में

आल्हा - पाठ : केदारनाथ सिंह व नामवर जी की उपस्तिथि में

Friday, December 26, 2014

मनुष्य की पाशविकता का आख्यान (पुस्तक समीक्षा)

(उपन्यास: ‘सेन्ट ऑफ़ ए गेम’, लेखक – राघव चन्द्रा, प्रकाशक – रूपा पब्लिकेशन्स इण्डिया प्रा. लि., दिल्ली 2014, मूल्य – 395 रु.; समीक्षक:  उमेश चौहान) 

अंग्रेज़ी भाषा के बहुत कम ही उपन्यास ऐसे होते हैं, जिन्हें हिन्दी के पाठकों के लिए भी उतना ही रुचिकर व सरोकारपूर्ण तथा वैचारिक स्तर पर उतना ही महत्वपूर्ण माना जा सकता है, जितना अंग्रेज़ी के पाठकों के लिए। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी राघव चन्द्रा का रूपा पब्लिकेशन्स, दिल्ली से 2014 में प्रकाशित अंग्रेज़ी उपन्यास ‘सेन्ट ऑफ़ ए गेम’ (शिकार की खुशबू) एक ऐसा ही विरल उपन्यास है, जो हमें कथा - साहित्य की उस नई एवं आधुनिकतम दुनिया में ले जाता है, जहाँ वन्य - जीव संरक्षण, विशेष रूप से बाघ (टाइगर) को बचाने की योजनाओं के नाम पर हमारे संरक्षित वनों में चल रहे विनाशकारी एवं क्रूर खेल का सच नंगा होकर सामने आता है। राघव चन्द्रा ने इस उपन्यास में सरकारी वन, पुलिस व जेल विभाग के कर्मियों व वन - तस्करों के बीच की मिलीभगत, रूढ़िवादी व सामाजिक पिछड़ेपन के कारण शेरों की निर्मम हत्या करने स्थानीय कसाई प्रवृत्ति के लोगों, दंभी राजपरिवारों, ब्रिटिश प्रशासन से लेकर वर्तमान समय के विदेशी व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक के एडवेन्चर - प्रेमी व लालची शिकारियों, टाइगर के अंग - अंग का व्यापार करने वाले राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय माफियाओं, पुंसत्व की शक्ति बढ़ाने वाले टाइगर के उत्पादों के भूमंडलीय कारोबारियों, वन - संरक्षण की गोहार लगाते हुए उसकी आड़ में इन तस्करों के धंधे में स्लीपिंग पार्टनर बनकर मज़ा लूट रहे तथाकथित समाजसेवियों, नेताओं व क्रांतिकारी नक्सलियों, विकसित देशों के प्रभुत्व के आगे नतमस्तक टाइगर संरक्षण के लिए गठित ‘साइटेस’ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, सभी की कारस्तानियों को एक रोचक कथानक के माध्यम से बखूबी उजाकर किया है।

कान्हा टाइगर रिज़र्व से बड़ी मादा नाम की एक सुन्दर व आकर्षक बाघिन का एकाएक ग़ायब हो जाना एक अन्तर्राष्ट्रीय ख़बर बनती है। यह ख़बर एक युवा एवं खोजी, आधुनिक विचारों वाली, खूबसूरत, धुन की पक्की, साहसी एवं सच्चरित्र ऐंग्लो - इंडियन पत्रकार शेरी पिन्टो ब्रेक करती है। वह वन - माफियाओं के खेल को अपनी जान जोख़िम में डालकर भी उजागर करना चाहती है। उसे अपनी मुहिम में कान्हा टाइगर रिजर्व के कड़कमिज़ाज़ व वन - संरक्षण के प्रति सत्यनिष्ठा रखने वाले उपनिदेशक गंगा का साथ मिलता है। किन्तु माफिया ताक़तवर हैं और उनकी पहुँच ऊपर तक है। गंगा सच्चाई की तह तक पहुँचे, उसके पहले ही उसका वहाँ से ट्रांसफर हो जाता है और मामले में जाँच बैठ जाती है। इसी बीच उपन्यास का मुख्य कथापात्र एन.आर.आई. रामचन्द्र प्रसाद पिता की बीमारी की ख़बर पाकर अमेरिका से अमरकंटक आता है, किन्तु पिता की मृत्योपरान्त उनके द्वारा वर्षों तक सहेजकर रखी गई टाइगर की खाल को वन - विभाग में जमा कराने के चक्कर में वह वन - तस्करों के गुर्गों के जाल में फँसकर जेल पहुँच जाता है। तभी शेरी पर जानलेवा हमला होता है और बच जाने पर उसे एक झूठे केस में फँसा दिया जाता है। किन्तु गंगा उसकी जमानत करवा लेता है। उसका संपादक उसे "हम एक कन्जर्वेटिव अख़बार हैं और हमें सरकार की मदद चाहिए" कहकर आगे बढ़ने से रोकना चाहता है। किन्तु शेरी जेल में बंद राम से मिलती रहती है, ताकि वह वह वन - तस्करों व बड़ी मादा के ग़ायब होने के रहस्य के बारे में और अधिक जानकारी हासिल कर सके। जेल से छुटकारा पाने के चक्कर में राम एक प्रतिष्ठित व्यवसायी की पहचान रखने वाले बाघों की अंतर्राष्ट्रीय तस्करी के गैंग के मुखिया फिरोज़ गोयनका उर्फ़ गोवा साहब के चंगुल में फँसकर जबलपुर से काठमांडू, म्यांमार, तथा चीन तक फैली उसकी व्यापार - श्रंखला की अवैध गतिविधियों में शामिल होता चला जाता है। शेरी भी अपनी खोजी कोशिशों के चलते म्यांमार में स्थित बाघों की घाटी तक पहुँच जाती है। वहाँ राम से मिलने पर ही उसे इस बात का पता चलता है कि बड़ी मादा किस तरह से इन अन्तर्राष्ट्रीय माफियाओं द्वारा नागालैंड बार्डर से होते हुए म्यांमार के रास्ते से चीन में स्थापित किए गए रेनबो टाइगर ब्रीडिंग पार्क तक पहुँचाई जा चुकी है।      

राघव चन्द्रा ने इस उपन्यास में टाइगर के नाम वाले उत्पादों के अन्तर्राष्ट्रीय आकर्षण एवं उनके व्यापार के चक्कर में नेस्तनाबूद होती जा रही बाघ की प्रजाति के बारे में गहरी चिन्ता व्यक्त की गई है। पूरी दुनिया में टाइगर बाम, टाइगर एयर, टाइगर बियर, टाइगर वाइन, टाइगर स्प्रे जैसे उत्पादों का बोलबाला होना यही दरशाता है कि लोगों को इस नाम में कुछ अद्भुत 'किक' मिलती है। राघव चन्द्रा ने इस उपन्यास में टाइगर से जुड़े व्यावसायिक हितों के गंदे चेहरे को उजागर करने के लिए पैन थेराप्यूटिकल्स नामक चीन की बायोजेनेटिक्स कंपनी ('पैन्थेरा' अर्थात तेंदुये से जुड़ा नाम) तथा भारत की ज़ेन्टिग्रिस इंडिया ('टिग्रिस' अर्थात टाइगर से जुड़ा नाम) नामक सॉफ्टवेयर कंपनी के बीच स्थापित होने वाले संयुक्त उपक्रम को माध्यम बनाया है। उपन्यास की नायिका शेरी का मानना है कि वन्य - जीवन हमेशा से एक व्यवसाय रहा है और हमेशा ही रहेगा। ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में मसालों, रेशम, चाय या मोतियों का व्यापार करने नहीं आई थी, वह तो बस व्यापारियों का मुखौटा लगाकर घूम रहे प्यासे ख़ूनी शिकारियों को भारतीय तटों तक पहुँचाने का माध्यम थी। उन्हें मसालों की सुगंध ने नहीं आकर्षित किया। उन्हें तो शिकार करने की आज़ादी, उसकी सनसनी, उसके रोमांस, उस पर फ़िदा सुन्दरियों के सान्निध्य, उनकी खुशबू ने आकर्षित किया। यह शिकार की खुशबू थी। यही उनकी असली उत्तेजना थी। शेरी को इस बात का भी अफ़सोस है कि भारतीय मुग़ल बादशाह व राजे - महाराजे भी बाघों के प्रति अत्याचार करने के मामले में अंग्रेज़ों से कम नहीं थे। बाघों की स्थिति से विक्षुब्ध शेरी याद करती है कि नरभक्षी बाघों के सुप्रसिद्ध शिकारी, जिम कॉर्बेट ने कहा था कि बाघ अमित साहस से भरा एक विशाल हृदय वाला भद्र पुरुष होता है। उसे स्पष्ट दिखाई देने लगता है कि आदमी ही असली जानवर है।


लेखक की गहरी व संवेदनापूर्ण भावाभिव्यक्ति का एक बेहतरीन नमूना उपन्यास के अंतिम खंड में वर्णित शिकार के दृश्य में सामने आता है। बाघ के नरभक्षी हो जाने की झूठी ख़बर अख़बार में छपवाकर तथाकथित वन्यजीवी - प्रेमी महाराजा अभिमन्यु सिंह, व्यवसायी फिरोज़ गोयनका, नक्सली कमांडर पैन्थर व उनके चंगुल में फँसा राम बिलासपुर के अचानकमाड़ के जंगल में शिकार के लिए जाते हैं और शेर को ललचाने के लिए मचान के पास लाकर बांधी गई गाय और उसके बछड़े को काटने के लिए अभिमन्यु राम को गड़ासे के साथ मचान से नीचे भेजता है। मचान से नीचे भेजा गया राम अपने स्वर्गीय पिता के मन में एक बाघ को मारने के कारण पैदा हुए आजीवन अपराध - बोध और उसके कारण उनके द्वारा किए गए पश्चाताप को याद करता है। उसकी सुप्त चेतना एकायक जागृत हो जाती है वह पतन के गर्त से बाहर निकल आता है। उसके बाद जो होता है, वह मचान पर बैठे उपन्यास के तीनों खलनायकों के लिए अकल्पनीय होता है। संक्षेप में ‘सेन्ट ऑफ़ ए गेम’ कान्हा टाइगर रिज़र्व, अमरकंटक और अचानकमाड़ से लेकर दक्षिण भारत, नेपाल, तिब्बत, म्यांमार, चीन तथा अमेरिका की सिलिकॉन वैली तक फैले एक भूमंडलीय षड्यंत्र की कहानी है, जिसकी उत्पत्ति ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर में न होकर उपनिवेशकाल में ही हो चुकी थी। टाइगर, जो वन्यजीवन के बायोटिक पिरामिड के शीर्ष पर स्थित है, उसे उस स्थान से समाप्त किया जाना राघव चन्द्रा की दृष्टि में एक असाधारण बात है, क्योंकि राजनीति के खेल में तो बगलग़ीर निपटाए जाते हैं, राष्ट्राध्यक्ष नहीं। मेरी दृष्टि में यह उपन्यास हिंसक पशु बनते जा रहे मनुष्य की पाशविकता का आख्यान है, जिसका अभयारण्य सार्वभौमिक है, किन्तु अंतिम परिणति भयानक व पीड़ादायक आत्मनाश ही है। 

मैं आने वाले समय की धमक सुनना चाहता हूँ (केदारनाथ सिंह का साक्षात्कार)

उमेश चौहान: हर कवि की कविता लिखने की शुरुआत किन्हीं विशेष परिस्थितियों के बीच होती है। आपकी कविता की शुरुआत किस माहौल में हुई?

केदारनाथ सिंह: जब मैंने लिखना शुरू किया तब देश आज़ाद हो चुका था। मेरा मानना है कि आज़ादी का मिलना एक बड़ी घटना थी, जो हमारे पूरे सामाजिक जीवन को प्रभावित करने जा रही थी और उसने ऐसा किया भी। उसके बाद के लगभग एक दशक अर्थात् लगभग 1960 तक, जिसे हम नेहरू काल भी कह सकते हैं, उसमें हम लोग थोड़ी उम्‍मीद के साथ चलते रहे। मैंने उस दौर में ‘अनागत’ शीर्षक से एक कविता लिखी थी। वह, ‘जो नहीं आया’ उस पर केन्द्रित थी। वह आता भी है और नहीं भी आता, कुछ इस तरह की स्‍थिति का चित्रण था उसमें। मुझे लगता था कि वह आ भी नहीं रहा है, जा भी नहीं रहा है। उम्‍मीद तो कर रहे हैं कि कुछ नया होने जा रहा है, लेकिन हो कुछ नहीं रहा। लेकिन इस बारे में मुझे और शायद पूरे देश को पहला बड़ा झटका 1962 में लगा। चीन - भारत संघर्ष एक बड़ी घटना थी जिसने हमारी पूरी सोच को प्रभावित किया। बहुत सारे हवाई किले, जो हमारे राजनेताओं ने बनाए थे, वे टूट गए। मैं आदरणीय पंडित नेहरू को इस बात के लिए साधुवाद दूँगा कि चीन के आक्रमण के बाद उन्‍होंने साहसपूर्वक रेडियो पर इस बात को स्‍वीकार किया कि हम एक कल्‍पना - लोक में रह रहे थे और हमने पहली बार एक बड़े झटके को महसूस किया। वह एक हवाई किला था। एक बड़े नेता की यह स्‍वीकारोक्‍ति सबसे चकित कर देने तथा झटका देने वाली थी कि ‘अरे हम इतने समय तक सचमुच स्‍वप्‍न - लोक में थे, जो ध्‍वस्‍त हो गया।’ उस समय इस पर मैंने 'धर्मयुग' में 'सन साठ के बाद की हिन्दी - कविता' शीर्षक से एक टिप्‍पणी लिखी थी, जिसमें पहली बार भारतीय मानस के मोह - भंग की चर्चा की थी। उसके बाद का दौर अनेक प्रकार की घटनाओं का दौर रहा, राजनीतिक स्‍तर पर और सामाजिक स्‍तर पर भी और उनसे हिंदी - कविता जुड़ती चली गई। हिन्‍दी - कविता प्रत्‍यक्षत: नक्‍सल आंदोलन से जुड़ी। प्रत्‍यक्षत: इसलिए कि कुछ कवि ऐसे थे, जो बाकायदा उस विचारधारा को न सिर्फ मानते थे बल्‍कि सक्रिय रूप से उसमें भाग लेने का भी प्रयास कर  रहे थे। यह उस मोह - भंग के बाद की स्‍थिति थी। सामाजिक जीवन में और हमारी पूरी आर्थिक संरचना में कोई बहुत मूलभूत परिवर्तन तो आया नहीं था। बड़े- बड़े बाँध बने, बाँधों से लोगों का उजड़ना शुरू हुआ, विस्‍थापन होना शुरू हुआ। यह कुछ ऐसी घटनाएँ थीं, जो उस समय उतनी भयावह नहीं लगती थीं। मेरे जैसे लोगों को उस समय लगता था कि विकास की कुछ कीमत तो चुकानी पड़ेगी ही। लेकिन आज मुझे लगता है कि विकास शब्‍द को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। यह शब्द आज एक 'मिसनॉमर' - सा लगता है। हमने इस शब्‍द को इतना पीटा है और विकास के नाम पर इतना कुछ किया है, जिसका विकास से कोई वास्‍ता  नहीं है। कितने सारे लोग इससे प्रभावित हुए हैं, प्रताड़ित हुए हैं, अपने स्‍थान से च्‍युत हुए हैं, उन्‍हें अपनी जमीन, अपना घर - बार छोड़ना पड़ा है। ऐसे लोगों की एक बड़ी जमात है। यह विकास नहीं है। विकास कहीं किसी के लिए हो रहा होगा। लेकिन आमजन के लिए यह शोषण का ही निमित्त था।

उमेश चौहान: विकास के इस छलावे को हिन्दी कविता ने किस प्रकार से पहचाना और उसका साहित्य के उस दौर पर क्या प्रभाव पड़ा?

केदारनाथ सिंह: विकास की इन विसंगतियों को हिन्‍दी - कविता में उस दौर के दो लोगों ने देखा। सबसे पहले मुक्‍तिबोध ने। उनकी कविताएँ बड़ी शक्‍तिशाली थीं। भाषा भी अद्भुत थी। कहा जाए तो कल्‍पना लोक के बरक्‍स एक लौह - भाषा उन्‍होंने गढ़ी। उसमें उन्‍होंने अपनी कविताएँ लिखीं। उनकी भाषा से लगता था कि जैसे उन्‍होंने कल - कारखानों की भाषा को समाविष्‍ट कर लिया हो कविता में। उन्‍होंने उस भाषा में बहुत ही अद्भुत कविताओं का सृजन किया। आज़ादी के बाद हिन्‍दी - कविता में पहला बड़ा परिवर्तन मुक्‍तिबोध ही लाए। उसके बाद धूमिल इसमें शामिल हो गए। धूमिल मेरे लिए एक विस्‍मयजनक कवि हैं। मैंने उनकी आरम्‍भिक कविताएँ भी पढ़ीं और सुनी थीं। उनमें कहीं ऐसे किसी विलक्षण कवि का कोई चिन्‍ह नहीं दिखाई देता था, जैसे बाद में वे हो गए। समय के साथ उनकी कविता में एक अद्भुत विकास हुआ। उन्‍होंने इतनी बड़ी छलांग लगाई, जिसकी कल्‍पना नहीं की जा सकती है। इतनी बड़ी छलांग वे इस वजह से लगा सके कि समय उसके पीछे अपना काम कर रहा था। वे समय को समझने वाले कवि थे। उन्‍होंने समय को पकड़ा और उसके सामने उन्‍होंने अपना कविता लिखने का पुराना तरीका उतारकर रख दिया। हमारे सामने एकदम से धूमिल का नया व्‍यक्‍तित्‍व उभरा। उन्‍होंने समाज को झकझोरकर रख दिया। इस प्रकार उस समय एक ओर एक बड़े स्‍तर पर मुक्‍तिबोध थे और दूसरी तरफ मुक्‍तिबोध से कम समय के लिए सामने आए, लेकिन अपने ढंग से बेहद सामर्थ्यवान कवि, धूमिल थे। शायद हिन्‍दी - कविता प्रतीक्षा कर रही थी ऐसे झटकों की। किसी भी परिवर्तन के लिए एक झटका मिलना जरूरी होता है।

उमेश चौहान: स्वातंत्र्योत्तर काल के प्रारंभिक दौर में ‘तीसरा सप्तक’ के कवि हिन्दी - कविता की अगुवाई कर रहे थे और प्रयोगवादी कविता व नई कविता अपनी अलग पहचान स्थापित करने में जुटी थी। ऐसे में आपको एक अलग दिशा में बढ़ने की प्रेरणा कैसे मिली?

केदारनाथ सिंह: जब छायावाद के बाद प्रगतिशील आंदोलन आया तब प्रेमचंद ने कहा कि हमें सौन्‍दर्य के प्रतिमान बदलने होंगे। उस समय की कविता अपनी परम्‍परा से बाहर निकलने का प्रयास तो कर रही थी, लेकिन निकल नहीं पाई थी। कविता की दिशा को वास्तव में बदला मुक्‍तिबोध और धूमिल ने। मेरा यही मानना है। बाद में नागार्जुन का जो विकास है, वह विलक्षण है। कालान्‍तर में नागार्जुन भी मुक्‍तिबोध की तरह ही हिन्‍दी-कविता के शीर्षस्‍थ परिवर्तनकारी कवि के रूप में स्‍थापित हो गए। केदारनाथ अग्रवाल व त्रिलोचन भी महत्‍वपूर्ण काम कर रहे थे। यह सब लोग नई कविता के समानान्‍तर कुछ नया व परिवर्तनकारी करने की उत्‍तेजना से भरे हुए थे। इनसे मुझे यह प्रेरणा मिल रही थी कि जो भी नया कर सकते हो, जो भी तोड़ - फोड़ कर सकते हो, वह करो। मैं यह नहीं कहता कि मुझे नई कविता से कोई प्रेरणा नहीं मिल रही थी, बिल्‍कुल नहीं कह सकता। उनके भीतर भी चेतना थी। किन्तु नागार्जुन व त्रिलोचन जैसे लोग एक नई जमीन की खोज कर रहे थे। जब नई कविता के रूप में उनके सामने एक चुनौती आई तो उन्‍होंने उसके बरक्‍स एक नई तरह की कविता खड़ी की, जो बहुत ही सच्‍ची (हालांकि इस तरह के विशेषण से कविता को समझा नहीं जा सकता) और सशक्‍त कविता थी। इस प्रकार नागार्जुन और त्रिलोचन जैसे कवियों ने एक समानान्‍तर कविता की धारा सृजित की। मैं इस परिवर्तन का साक्षी रहा हूँ। त्रिलोचन मेरे काव्य-गुरु रहे हैं। अद्भुत व्‍यक्तित्व था उनका। वे मेरे छात्रावास में भी आए थे। ‘भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल’ जैसी कविता ने मुझे हिला कर रख दिया था। जैसे कोई कोड़ा मार रहा हो। मैं विचार करता रह गया कि त्रिलोचन जैसा विद्वान कवि अपने बारे में एक ऐसा बयान क्‍यों दे रहा है, वह भी पारम्‍परिक शालीन भाषा को छोड़कर, ठेठ सड़क की भाषा में। यहाँ त्रिलोचन भिखारी नहीं हैं, भिखारी तो समाज है, जिसके पास अब कुछ बचा नहीं है। उस दौर में मेरे जैसे नवागत कवि को ऐसे ही अनेक झटके लगे और मैं एक अलग दिशा में बढ़ता चला गया।

उमेश चौहान: उस समय के प्रमुख कवियों से अलग प्रारम्भ में आपने केवल गीत लिखे? इसका कोई विशेष कारण था? बाद में आपने गीत लिखना क्यों छोड़ दिया?

केदारनाथ सिंह: मैंने अपनी कविता की यात्रा गीतों से शुरू की थी। उसका कारण यह था कि मैं लोक-गीतों से बहुत प्रभावित था। गाँव से आया था, इसलिए लोक-गीतों की गूँज मेरे भीतर थी। उनमें जो लयात्‍मकता थी, वह मुझे बहुत प्रभावित करती थी। गाँव का माहौल भी मुझे खींचता था। खेत, पगडंडियाँ, नदी और गाँव का पूरा परिवेश मेरे साथ जुड़ा हुआ था। जब मैं गाँव छोड़कर बनारस आया तो वह भी एक बड़े गाँव की तरह ही लगा, लेकिन फिर भी वह एक शहर था। वहाँ आकर एकदम से गाँव के जिस परिवेश को छोड़कर मैं आया था, उसके प्रति मेरे भीतर एक अद्भुत आकर्षण बढ़ा। उस बोध अथवा उस नये अनुभव के भीतर से सबसे पहले मेरे गीत पैदा हुए और मैंने कुछ गीत लिखे। हालांकि मैंने ज्‍यादा गीत नहीं लिखे हैं। मुझे एक बात बहुत जल्‍दी ही समझ में आ गई कि सिर्फ गीतों से काम नहीं चलने वाला है। बाद में 1960 के दशक में मैंने गालिब की गजलें पढ़ीं। उर्दू के गीत ही हैं ग़ज़लें। उनका एक शेर है, ‘बकद्रे शौक नहीं, ज़र्फ़े तंग्नाए ग़ज़ल। कुछ और चाहिए वुसक मेरे बयाँ के लिए।’ जब इतनी महान ग़ज़लें लिखने के बाद गालिब जैसा महान युगदृष्‍टा शायर यह कह रहा हो कि ‘कुछ और विस्तार चाहिए’ तो मेरी आँखें खुल गईं। गालिब को लगा था कि ग़ज़ल का कलेवर पर्याप्‍त नहीं था। वह छोटा पड़ रहा था। जैसे बहते हुए जल के लिए पात्र छोटा पड़ जाता है। स्पष्ट था कि वह जो कहना चाह रहे थे उसमें फैलाव था, विस्‍तार था, जिसके लिए किसी और फार्मैट की जरूरत महसूस हो रही थी उन्‍हें। हिन्‍दी में गीत छायावाद से आये थे। मुझे उन गीतों की एक रूढ़ि पसन्‍द नहीं आ रही थी कि गीत की जो टेक होती है, अर्थात पहली पंक्‍ति, वह बाद की सारी पंक्‍तियों को डिक्‍टेट करती है। उसका स्‍थान पूरी कविता में लगभग एक डिक्‍टेटर की तरह होता है। मुझे यह कविता की स्‍वाभाविक रचना-प्रक्रिया का स्‍वरूप नहीं लगा। इसीलिए मैं गीतों से हट गया। मैंने गीतों को तोड़ना शुरू किया। कभी इस परंपरा का निर्वाह करता, कभी उसे छोड़ देता। भक्‍तिकाल के कवियों ने तमाम पद लिखे हैं। उनमें बड़ी आजादी थी, छूट थी। वो लोक के निकट थे और लोक से प्रेरणा लेते थे। गीत को अगर ज़िन्दा रहना है, तो लोक से जुड़कर ही ज़िन्दा रह सकता है वह। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के गीत अगर आज भी गाए और पढ़े जाते हैं, तो उसका सबसे बड़ा कारण यह है, कि उनके गीत लोक-परंपरा से प्रेरणा लेते हैं। टैगोर ने लोक-परंपरा से प्रेरणा लेते हुए, नई भाषा का आविष्‍कार किया, नई लय खोजी। वे जहाँ भी किसी नई लय को सुनते थे, उसे अपनी कविता में पकड़ने की कोशिश करते थे। वे बहुत संवेदनशील थे और अपनी आँख - कान हमेशा खोलकर रखते थे। हमारे पूर्ववर्ती हिंदी कवियों ने भी बहुत से गीत लिखे थे। लेकिन उनकी भाषा आदर्श भाषा नहीं थी। वह भाषा कविता के लिए आदर्श हो ही नहीं सकती थी। हमारे एक बड़े कवि, भवानी प्रसाद मिश्र, कहते थे कि वे प्रसाद, निराला आदि को पढ़ ही नहीं सकते, क्‍योंकि उनकी भाषा बड़ी विचित्र है। वह बड़ी सजी-बजी भाषा थी, संस्‍कृत - बहुल भाषा थी। उसको निराला ने बदला। दो निराला हैं, एक आरम्‍भिक निराला और दूसरे बाद के निराला। बाद के निराला एकदम बदले हुए हैं। ‘जूही की कली’ से ‘कुकुरमुत्‍ता‘ तक की परिवर्तन की लंबी छलांग निराला जैसा कवि ही लगा सकता था। उन्‍होंने ‘बांधो न नाव इस ठांव’ जैसे गीत लिखे, जो लोक - गीत जैसे ही हैं। यह सब समझ जाने के बाद गीत मुझे अपर्याप्त लगने लगे। जो सांचा हिंदी की परम्‍परा में गढ़ा गया था, उसको तोड़ने की क्षमता मुझमें नहीं थी। इसलिए मैंने गीत का चक्‍कर छोड़ दिया तथा कुछ और करने की ठान ली। मैंने गीत की लय ले ली और उसको आजकल की कविता की भाषा में ढालने की कोशिश की। इसलिए मेरी कविता में थोड़ी लयात्‍मकता बनी रही। मैंने लय के मूलभूत तत्‍व को छोड़ा नहीं। वह मेरे मुक्‍त छंद में भी है। गद्यवत कविता में भी है। मुझे लय ने कभी नहीं छोड़ा और मैंने भी उसे कभी नहीं छोड़ा।

उमेश चौहान: आपके विभिन्न काव्य - संग्रहों में छंदोबद्ध कविताएँ भी शामिल हैं। क्या छंद के प्रति आपको अभी भी लगाव है?

केदारनाथ सिंह: मेरे अधिकांश संग्रहों में कुछ छंदोबद्ध कविताएँ भी हैं। अभी जो मेरा नया कविता - संग्रह आया है, 'सृष्टि पर पहरा' उसमें भी हैं। छंद को मैंने कभी छोड़ा नहीं। छंद कोई आसमान से थोड़े ही टपका है, वह जनता की विरासत है। वह लोक से आया है। छंद को हम लोक से जोड़कर ही ज़िन्‍दा रख सकते हैं। लोक गाँव में होता है और शहर में भी होता है। उससे जोड़कर ही हम छंद को मजबूत कर सकते हैं। उसी से नये-नये छंद पैदा होते हैं। यह काम होना ही चाहिए। यह काम नहीं किया गया, यही दु:खद है। मुझे लगता है कि छंद और बेछंद, यह कविता के दो पांव हैं। कविता दोनों में ही होती है और दोनों को साथ - साथ ही चलना चाहिए। छंद को छोड़ नहीं देना चाहिए। उसकी शक्‍ति का भरपूर सदुपयोग करना चाहिए, क्‍योंकि वह जनता की विरासत है। मैं देखता हूँ कि आज छंद के बारे में कुछ रूढ़िया बन गई हैं। जब ऐसी रूढ़ियाँ बने तो हमें आचार्य रामचन्‍द्र शुक्‍ल द्वारा दिए गए संदेश पर गौर करते हुए थोड़ा ठहर जाना चाहिए और फिर से लोक के पास जाना चाहिए और फिर वहाँ से प्रेरणा लेकर कविता को रिचार्ज करना चाहिए। मुझे लगता है कि आज इसी बात की जरूरत है। मुक्‍तिबोध ने एक बात कही थी कि कविता एक नया रूप धारण कर रही है, जिसमें हो सकता है कि गद्य ही छंद बन जाए। आज गद्य तो छंद बन ही गया है। गद्य में वह शक्‍ति थी और कविता को अंतोगत्‍वा वहाँ जाना ही था। मैं तो कहता हूँ कि कविता ने गद्य में सेंध लगाई है और गद्य के भीतर जो काव्‍य - तत्‍व छिपा हुआ था, उसे वहाँ से ढूँढ़ निकाला है। चोरी की है उसने। यह बहुत सुखद चोरी है। छंद शास्‍त्रकारों ने नहीं बनाए हैं। उन्‍होंने तो बाद में छंदों की मात्राएँ गिनी और उनका शास्‍त्र गढ़ा। हमारे भक्‍त-कवियों ने लोक - तत्‍वों का समावेश करके नए - नए छंदों में महान कविताएँ लिखी हैं।

उमेश चौहान: आपने अपनी कविता को एक नए साँचे में ढालकर हिन्दी - कविता को एक नई दिशा दी। इसके मूल में क्या था, अर्थात यह सब कैसे हुआ?

केदारनाथ सिंह: मेरी काव्‍य - रचना में आया बदलाव अनजाने ही हो गया। कविता का नया ढांचा गढ़ने का मैंने कोई सचेत प्रयास नहीं किया। यह समय के दबाव के तहत अपने आप होता चला गया। मुझे यह जरूर लगता था कि प्रगतिशील धारा की जो दिशा थी, कविता का उससे थोड़ा अलग स्‍वरूप बने। मैं नई कविता की धारा में तो शामिल नहीं था। मैं उसके हाशिए पर था। मैं देख रहा था कि दूसरी तरफ क्‍या  हो रहा है। नई कविता ने जो कुछ भी हमें दिया था, मैं उसे भी साथ लेकर चलना चाहता था। मैंने कभी परम्‍परा को नकारा नहीं। उसमें जो कुछ भी अच्‍छा है उसे हमेशा साथ लेकर चलने की कोशिश की। नए ढंग से बात कहने का एक स्‍वरूप बने, मेरे लिए यही सर्वोपरि था। यह मेरा सौभाग्‍य था कि मैं एक लंबे समय तक शहर से परे रहा। गाँव की बात नहीं कर रहा हूँ। एम.ए. तथा पीएच.डी. करने के बाद मुझे छोटे से एक कस्‍बे में नौकरी मिली, जो गाँव की तरह ही था। वहाँ मैं 13 - 14 साल रहा। मैंने वहाँ लोगों को करीब से देखा। गाते हुए लोगों को भी देखा और भूख से संतप्‍त चेहरों को भी देखा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को बुलाया था एक बार मैंने वहाँ और उनको उस इलाके में ले गया था। अगर मैं उनके साथ न गया होता तो भारत का असली चेहरा न देखा होता। भारत के उस चेहरे को मैंने तब तक देखा ही नहीं था। वह बहुत ही पिछड़ा हुआ तराई का इलाका था। उन दृश्‍यों की विद्रूपता ने मुझे फिर से कविता के स्‍वरूप के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया।

उमेश चौहान: आप अन्तर्राष्ट्रीय कविता से निरन्तर सम्पर्क में रहे हैं। क्या आपकी कविता के नए स्वरूप के पीछे विश्व - साहित्य का भी कुछ प्रभाव है?

केदारनाथ सिंह: विश्‍व - कविता के साथ मेरा रिश्ता हमेशा बदलता रहा है। आरम्‍भ में डिलन थॉमस व दूसरे यूरोपीय कवियों की तरह की कविताएँ लिखने का मन करता था। किंतु पहली बार जिस कवि की कविता पढ़कर मुझे एक बड़ा झटका लगा, वह ब्रेख़्त थे। नेरुदा भी मुझे अच्‍छे लगते थे, लेकिन उन्‍होंने उतना झटका मुझे नहीं दिया, जितना ब्रेख़्त ने दिया। वह उनकी एक सीधी - सपाट, लेकिन उत्‍कृष्‍ट कविता थी। मुझे कई बार आश्‍चर्य होता था कि ब्रेख़्त कैसे उस तरह की कविताएँ लिख लेते थे। मेरा मानना है कि संदेश देते हुए कविता लिखना ख़तरे का काम है, क्‍योंकि कविता का काम संदेश देना नहीं है। लेकिन दो कवि लगातार यह ख़तरा उठाते हैं। वे सीधे संदेश देते हैं। पहले थे तुलसीदास और दूसरा मैंने ब्रेख़्त को पाया। वे सीधा संदेश देते हैं, किंतु फिर भी कविता पैदा कर देते हैं। जब मैंने पहली बार 1964 में ब्रेख्‍त को पढ़ा तो उनसे बहुत ही ज्‍यादा प्रभावित हुआ।

उमेश चौहान: आज की कविता पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह प्रभावहीन है, पाठकों में रुचि नहीं जाग्रत करती और उनकी स्मृति में ज्यादा दिन नहीं टिकती। इस बारे में आपका क्या विचार है?

केदारनाथ सिंह: जो कविताएँ एक खास तरह की बोल - चाल की लय में लिखी जाती हैं, उनसे सामान्‍यजनों को जुड़ने में कठिनाई नहीं होती है। जब तक पाठक या श्रोता कविता को अपनी आवाज़ में रिक्रिएट नहीं करेगा, त‍ब तक वह उससे जुड़ेगा नहीं। अभी कुछ दिन पहले जे.एन.यू. की एक गोष्‍ठी में कोई सज्‍जन मेरी एक कविता के बारे में कुछ बोल रहे थे। उन्‍होंने मेरी कविता ‘पानी की प्रार्थना’ उद्धृत की। वे वहाँ जिस तरह से उसे पढ़ रहे थे, उससे उस कविता का जरा - सा भी संप्रेषण नहीं हो रहा था। कविता को कविता की तरह पढ़ने की कला भी सिखाई जानी चाहिए। यह परम्‍परा से आता है। यह कवियों का काम भी है। उन्हें स्‍कूल व कॉलेजों में जाना चाहिए और क्‍लास में कविताएँ पढ़कर सुनानी चाहिए। जब बच्‍चे आज की कविता की लय से जुड़ेंगे तभी जाकर वे आज की कविता की संवेदना से, उसके परिवेश से, उसकी अंतर्वस्‍तु से, उसके प्राणतत्‍व से जुड़ पाएँगे। तभी जाकर कविता और सामान्‍यजन के बीच की दूरी कम हो पाएगी। हमारी यह जो खड़ी बोली है, इसने भी पिछले लगभग डेढ़ - दो सौ साल में एक लंबी छलांग लगाई है। इसी अवधि में इसने कई युग पार किए हैं। दुनिया की किसी भी भाषा ने इतने कम समय में कई युग पार नहीं किए होंगे। लेकिन इसमें हम घाटे में भी रहे हैं। घाटा यह रहा है कि हमारी सारी महान परंपरा की भाषा छूट गई है। आज सूर - तुलसी की भाषा हमारी भाषा नहीं रही। विद्यापति की भाषा हमारी भाषा नहीं रही। रीतिकाल के कवियों की भाषा हमारी भाषा नहीं रही। हमने एक नई भाषा गढ़ी है। हमने पुरानी भाषाओं से बहुत सारी प्रेरणा तो ली, लेकिन अपनी अलग भाषा गढ़ ली।

उमेश चौहान: तो क्या कविता को पारम्परिक छंदों और भाषा की ओर लौटना चाहिए? क्या ऐसा कहीं और भी हो रहा है? जैसे पहले दिनकर की कविताएँ लोकप्रिय थीं और इधर के दशकों में दुष्यन्त की ग़ज़लें, क्या आज की कविता में भी ऐसा ही कुछ बदलाव आना चाहिए?

केदारनाथ सिंह: नई भाषा को गढ़ने में उर्दू के कवियों ने होशियारी से काम लिया है। उन्‍होंने ग़ज़ल की परम्‍परा को कायम रखा। वह मंच से भी जुड़ी थी। हमने अपने सारे मंच खो दिए। ग़ज़ल आज भी ज़िन्‍दा है। उसमें नए सरोकारों की बातें भी की जा रही हैं। यह विचार का विषय होना चाहिए कि ग़ज़ल का गेय स्‍वरूप आज भी क्यों प्रासंगिक है, किन्‍तु हमारे गीत का नहीं। ग़ज़ल जिन्‍दा ही नहीं है, उसमें नई से नई बात कहने की ताकत भी बरकरार है। हिन्‍दी में उभरे नवगीत भी यह काम नहीं कर पा रहे। वे भी आज ऋतु - चक्र बनकर रह गए हैं। नवगीत वह काम नहीं कर पाएगा जो ग़ज़ल कर रही है, क्‍योंकि उसका भी एक ढर्रा बन गया है और उसमें वह लचीलापन नहीं आ पाया है, जो उर्दू ग़ज़ल में है। कुछ करने के लिए उसे इस ढर्रे से बाहर आना होगा। आज जिसे हम समकालीन कविता कहते हैं, इसकी भी रूढि़याँ बन गई हैं और वह भी एक विशेषीकृत संरचना में ढलकर रह गई है, जिसे सामान्‍य पाठक नहीं पढ़ पा रहा। इससे पाठक को कैसे जोड़ा जाय यह एक बड़ा सवाल है। उर्दू आज भी पाठक से जुड़ी हुई है। इसे उर्दू कवियों ने जोड़ लिया है। वे भी खड़ी बोली का इस्‍तेमाल करते हैं। लेकिन जब वे अपनी ग़ज़ल या नज़्म पढ़ते हैं तो वह लोगों तक पहुँचती है, क्‍योंकि उन्होंने परंपरा के अच्‍छे तत्‍वों को छोड़ा नहीं है। वे अपनी ग़ज़लों में उनका इस्‍तेमाल करते रहते हैं। हिन्‍दी के कवियों ने भी ग़ज़ल की विधा को अपनाया। दुष्‍यन्‍त मेरे दोस्‍त थे। वे मुख्‍यत: गीतकार थे, लेकिन उन्‍हें ग़ज़ल की विधा ने आकर्षित किया। उन्‍होंने उससे ताकत अर्जित की और नए ढ़ग से बातें करते हुए अपना सिक्‍का जमा दिया। भारतेन्‍दु से लेकर प्रसाद व निराला तक, हमारे सारे आधुनिक कवियों ने ग़ज़लें लिखी हैं। शमशेर और त्रिलोचन ने भी लिखीं। यह ग़ज़ल की ताकत है कि वह बार - बार आपको अपनी ओर खींच लेती है। हमने गीत में वह ताकत क्‍यों नहीं पैदा की? हमारे भक्‍त - कवियों ने इसे कर लिया था। हमारी खड़ी बोली का गीत इस काम को क्‍यों नहीं कर पाया, इस प्रश्‍न से जूझने की कोशिश कम ही की गई है। इसे किया जाना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा और कविता गाहे - बगाहे छंद का इस्‍तेमाल नहीं करेगी, तब तक वह मजबूत नहीं होगी। यह काम बांग्ला जैसी भाषाओं में आज भी हो रहा है। यह जरूरी नहीं है कि सारी की सारी कविता छंद की ओर लौट जाए। लेकिन छंद की जो शक्ति जनता से आई थी, उसे ऐसे एकदम छोड़ देना ठीक नहीं। जितनी भी महान कविताएँ हैं, उनमें भी छंद है। मुक्तिबोध की कविताओं में, यहाँ तक कि ‘अंधेरे में’ जैसी बहुचर्चित कविता में भी छंद है। इस कविता में अन्तर्निहित लय वर्णवृत्‍त को तोड़कर उसे छंदमय बना देती है। हमें छंद की शक्ति को नए स्‍तर पर आविष्‍कृत करना चाहिए। हम यही नहीं कर पा रहे हैं। उर्दू वाले इसमें हमसे आगे हैं। उन्‍होंने इसे साध्‍य बनाया है।

उमेश चौहान: पिछले दो दशकों में पूरे विश्व की सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक संरचना में व्यापक बदलाव आया है और भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है? इस परिवर्तन का आप कविता पर किस तरह का प्रभाव पड़ता देख रहे हैं?

केदारनाथ सिंह: मैं कोई आर्थिक विशेषज्ञ नहीं हूँ, लेकिन 1990 के बाद के विकास को मैं काफी हद तक दुर्भाग्‍यपूर्ण मानता हूँ। सोवियत संघ का विघटन भी विश्‍व व्‍यापार संगठन जैसी संस्‍था बनने के पीछे एक बड़ा कारण रहा है। दुर्भाग्‍यपूर्ण यह भी है कि जो एक महान प्रयोग वहाँ हो रहा था, वह विघटित हो गया। इस विघटन ने ही विश्‍व में वर्तमान परिस्थितियों के पैदा होने का मौका दिया। इसके पहले सरकार में उदारीकरण शब्‍द  का नाम भी नहीं था। हिन्‍दी का सबसे अनुदार शब्‍द है, उदारीकरण। किसके प्रति है यह उदारता? जब भी मैं इस शब्‍द को सुनता हूँ तो यह मुझे परेशान करता है। सामाजिक विकास के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है, उससे आर्थिक विषमता की खाईं बढ़ती ही जा रही है। समाज में इन्‍सानों के बीच की खाईं भी। इस दौर में जो कुछ भी हो रहा है, वह दुर्भाग्‍यपूर्ण है। मैं इसे एक चुनौती भरा दौर मानता हूँ। कवि इससे टकरा तो रहा है, अनेक प्रकार के प्रयास कर रहा है और इस पर चोट भी कर रहा है। आप नए कवियों की कविताएँ पढ़े तो आपको उनमें इस पर चोट करने वाली पंक्तियाँ जरूर मिलेंगीं। कवि इस विषय से जुड़ रहें हैं। लेकिन किसी भी टक्‍कर से जो आग निकलती है, वैसी आग अभी नहीं दिखाई पड़ रही है। लेकिन मैं निराश होने वाला व्‍यक्ति नहीं हूँ। यह आग एक दिन दिखाई पड़ेगी। मैं इस दौर के विकास शब्‍द के आगे एक प्रश्‍नचिन्ह लगाना चाहता हूँ। मैं अभी भी अपने आपको संतुष्‍ट नहीं कर पाया हूँ कि हमें क्‍यों आगे बढ़कर आदिवासियों के विकास का जिम्‍मा लेना चाहिए? कौन होते हैं हम? हमने जो आज तक किया है क्‍या उससे वे सुखी हैं? हम उनको अपने तरीके से विकसित होने देने में मदद करें, अधिक से अधिक हम उनकी रोजमर्रा की समस्‍याएँ हल करने में मदद करें और उन्‍हें अपने ढ़ंग से अपने समाज में जीने दें, यही हमारा काम होना चाहिए। आज हम उन्हें अपने पैमाने से नापते हैं और यह पैमाना वह है, जो इस उदारीकरण के जमाने में बना है। यह एक दु:खद स्थिति है। इसी से पैदा हुआ था नक्‍सल आंदोलन। आज का माओवादी आंदोलन भी इसी स्थिति की उपज है। मैं हिंसा का विरोधी हूँ। मुझे हिंसा की स्थिति बड़ी दुर्भाग्‍यपूर्ण लगती है समाज के लिए। जो हिंसा का सहारा ले रहे हैं, उनका तरीका मुझे कतई पसन्द नहीं। लेकिन कुछ लोगो में सच्ची पीड़ा भी जरूर होगी, वरना वे जंगल में क्‍यों रहते? वहाँ रहकर वे निश्चित ही सुखी नहीं हैं। एक जगह से दूसरी जगह भागते फिरते हैं। हमने ही उनको इसका अवसर दिया है। ऐसी ही और भी तमाम विसंगतियाँ हैं। देश में जो आदिवासी आंदोलन और बहुत सारे नए - नए विमर्श पैदा हो रहे हैं, ये सब इसी की उपज हैं।

उमेश चौहान: हिन्दी - कविता में 1990 के बाद तेजी से स्त्री - विमर्श, दलित - विमर्श व हाशिए पर अलग - थलग पड़े मानव - समूहों की चिन्ताएँ उभरी हैं। आप इन विभिन्न विमर्शों के उभार को तथा उन पर केन्द्रित साहित्यिक आलोचना को किस दृष्टि से देखते हैं?

केदारनाथ सिंह: मैं इन सारे विमर्शों को 1990 के बाद के सामाजिक - राजनीतिक परिवर्तनों से जोड़कर देखना चाहूँगा। ये सब अपना - अपना हक मांग रहे हैं, जो उचित है। यह लोकतंत्र का विकास है। लोकतंत्र का जिस तरह का विकास राजनीतिक व्यवस्‍था कर रही है और जो संसद व कार्यपालिका के माध्‍यम से सामने आ रहा है, वह शंकित करता है। उसके भीतर से जो असंतोष पैदा हो रहा है, उसी असंतोष की उपज हैं ये सारे आंदोलन। मैं इन्‍हें इसी स्‍वरूप में देखता हूँ और इन विमर्शों का काफी हद तक मैं स्‍वागत करता हूँ। लेकिन साहित्‍य को विमर्शों में घटाकर नहीं देखा जा सकता। उस पैमाने पर हम साहित्‍य का मूल्‍यांकन कर ही नहीं सकते। यह आदिवासी कविता है, इसलिए अच्‍छी है, यह पैमाना ठीक नहीं। चूँकि यह अच्‍छी कविता है, इसलिए अच्‍छी कविता है, यही पैमाना उचित होगा। यह अमुक आदमी की कविता है, इसलिए अच्‍छी कविता है, ऐसा नहीं होना चाहिए। कविता या कोई भी रचना, रचना की कसौटी पर जाँची-परखी जानी चाहिए। उसे अलग से कोई रियायत नहीं दी जानी चाहिए। सभी कुछ खुलकर मैदान में आना चाहिए। हमें कोई रियायत नहीं देगा, हम भी किसी को रियायत नहीं देंगे, ऐसा ही होना चाहिए। कोई मेरी कविता को ख़ारिज़ करता है तो करे, यह उसका हक है। यदि उसकी बहुत सारी बातें हमारे साहित्‍य में नहीं आ रही होंगी तो वह ऐसा करेगा ही। जब - जब ऐसी परिस्थिति पैदा होती है, ऐसा होता ही है। इसी के कारण अंबेडकर जैसा महान विचारक नेता पैदा हुआ। उनके विचारों का व्‍यापक प्रभाव पड़ा। मुझे नहीं लगता कि आज के पूरे साहित्यिक परिदृश्‍य पर किसी अन्य राजनीतिक नेता का इतना बड़ा कोई प्रभाव पड़ा होगा, जितना अंबेडकर का पड़ा। मैं विमर्शों और विमर्शों से जुड़े साहित्‍य को इसी नज़रिए से देखता हूँ।

उमेश चौहान: दलित विमर्श की दृष्टि से गद्य - साहित्य की अपेक्षा हिन्दी - कविता पीछे रही है। आप इसका कोई विशेष कारण पाते हैं?

केदारनाथ सिंह: जहाँ तक दलित विमर्श का सवाल है, गद्य में उसका ठीक - ठाक स्‍थान है। आत्‍मकथाओं में आदिवासी - लेखन सर्वश्रेष्‍ठ रूप में सामने आ रहा है। वहाँ वह हमें ज्‍यादा छूता है, क्‍योंकि वहाँ उनकी अपनी बात है। वहाँ दलित लेखक सीधे अपनी वे बातें कहते हैं, जिनसे हम इतने परिचित नहीं हैं। गाँव में जब मैं उनके निकट से गुजरता था और उनको मरे हुए पशुओं का चमड़ा उतारते देखता था तो यही समझता था कि वे चमड़े को निकालकर उससे जूते या वैसे ही अन्‍य कोई सामान बनाते होंगे। लेकिन मैं वह नहीं जानता था, जो बाद में तुलसीराम की आत्‍मकथा में पढ़ा कि वे उस मरे हुए पशु का मांस भी निकालकर मोहल्‍ले में बांटते थे और वह खाया जाता था। यह मेरे लिए शर्म से जमीन में गड़ जाने वाला एक झटका था। यह झटका देने वाली सच्चाई मुझे उनकी आत्‍मकथा से ही पता चली। ऐसी ही आत्‍मकथाएँ और भी है इस परम्‍परा में। ओमप्रकाश वाल्‍मीकि की कहानियाँ भी बड़े अच्‍छे रूप में सामने आईं हैं। उनकी कविताओं ने भी अच्‍छा  योगदान दिया है। और भी अनेक लेखक व कवि यह काम कर रहे हैं। मैं इसे विमर्श नहीं कहूँगा। केवल एक प्रवृत्ति मानूँगा। यह साहित्‍य की एक नई धारा है। कोई चाहे तो इसे विमर्श कह सकता है। यदि हम इस विमर्श से निकली हुई सौन्‍दर्य - संरचना के आधार पर दलित - साहित्‍य का मूल्यांकन करेंगे तो वह अधूरा मूल्‍यांकन होगा। मूल्‍यांकन के आधार को तो सामान्‍यीकृत बनाना ही पड़ेगा। वह हमें भी उस पर कसेगा और उन्‍हें भी। मूल्‍यांकन का ऐसा कोई आधार बन नहीं पाया है अभी तक। लेकिन मैं यह जरूर कहूँगा कि एक लंबी दूरी तय कर लेने के बाद मराठी दलित कविता ने अब एक स्थिर राह पा ली है और वह लौटकर अपनी पूरी कविता की परंपरा को, जो दलितों ने नहीं लिखी है, उसको भी समझने की कोशिश कर रही है। मर्ढेकर ने मराठी में वह काम किया है जो हमारे यहाँ अज्ञेय जैसे कुछ कवि कर रहे थे। वे मराठी के बड़े सशक्‍त कवि थे। इधर उन पर कई दलितों ने किताबें लिखी हैं। उन्‍होंने पाया है कि उनकी कविता में दलित-चेतना के कई तत्‍व मौजूद हैं, बस उसे खोजा नहीं गया था। वे इसे खोजने का प्रयास कर रहे हैं। संत ज्ञानेश्वर व तुकाराम पुराने भक्त कवि थे, जिनकी अपनी एक परंपरा है। समकालीन दलित आलोचक उनकी कविता में अपनी चेतना की जड़ें तलाश रहे हैं। इस तरह का एक संबंध वहाँ साहित्‍य में तब स्‍थापित हो रहा है, जब उन्‍होंने स्‍वयं विकास की लंबी यात्रा तय कर ली है। मेरी एक बार नामदेव धसाल से मुलाकात हुई थी। वे पुराने कवियों के बारे में, परंपरा के बारे में ढेर सारी बातें करते रहे। उन्होंने तुकाराम के बारे में, ज्ञानेश्‍वर के बारे में तमाम बातें की। इस प्रकार मराठी की दलित - कविता में परंपरा से एक बहुत ही सुखद संवाद हो रहा है। ऐसा संवाद हिन्‍दी की दलित - कविता में कहीं नहीं है। शायद आगे कभी हो। दलित - लेखन के संदर्भ में हिन्‍दी - कविता का विकास अभी उतना ज्‍यादा नहीं हुआ है। लेकिन यह एक दिन होगा, इसकी मैं बहुत उम्‍मीद रखता हूँ। क्‍योंकि अनुभव का एक ऐसा खज़ाना उनके पास है, जो हमारे पास नहीं है। सिर्फ उसको अधिक से अधिक भाषा में ढाल पाने की विधियाँ उनको खोजनी है, और एक विधि नहीं, अनेक विधियाँ। उनको खोजने के संघर्ष में ही वे लगे हुए हैं। इसमें से ही मुझे आगे चलकर एक बड़े दलित - साहित्‍य के पैदा होने की संभावना दिखती हैं।
           
उमेश चौहान: स्त्री - विमर्श आज की कविता के केन्द्र में है। समाज में स्त्रियों की समस्याओं के प्रति काफी जागरूकता भी आयी है। आपकी इस बारे में क्या धारणा है?

केदारनाथ सिंह: स्‍त्री भी हमारे समाज में दलितों ही काफी हद तक शोषित रही है। अब वह मुक्‍त होने की कोशिश कर रही है। लेकिन अभी भी तमाम सामाजिक वर्जनाएँ हैं जो काम कर रही हैं। इसके अनेक भेद - उपभेद हैं। जब समाज में जनतांत्रिक चेतना पैदा हुई तो उन्‍हें भी लगा कि उनके भी कुछ हक हैं, अधिकार हैं।  वे अपने अधिकारों से वंचित हैं। यह अधिकार की चेतना उनके भीतर प्रबल होती जा रही है। संपत्ति में अधिकार, परिवार में अधिकार, कार्य - क्षेत्र में अधिकार, समाज व राजनीति में अधिकार आदि - आदि। निजी इच्‍छाओं का दमन, पितृसत्‍ता के प्रभाव के कारण समाज में पिछड़ जाना, शादी करके घर बैठ जाना, इन सब बातों के प्रति उनके भीतर एक चेतना जगी है। समाज की इन असंगतियों को मिटाने के लिए वे आगे आई हैं। उन्‍होंने काफी कुछ लिखा है। कई स्‍त्री रचनाकारों ने बहुत अच्‍छी कविताएँ लिखी हैं। कहानियाँ तथा उपन्‍यास भी लिखे जा रहे हैं। मैं फिर कहूँगा कि इस महत्‍वपूर्ण अभियान को मैं केवल विमर्श में घटाकर नहीं देखना चाहता। विमर्श के कारण जो सबसे ज्‍यादा क्षति हुई है, उसको अनुभव करने वाला समाज, फ्रांस का समाज है। वहाँ इतने ज्यादा विमर्श हुए हैं कि कविता में प्राणवन्‍त लेखन लगभग दब सा गया है।

उमेश चौहान: कुछ लोग कहते हैं कि आपने अपनी कविताओं में स्त्री विमर्श को उतना स्थान नहीं दिया है, जितना आज के समय की अपेक्षा है। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

केदारनाथ सिंह: हो सकता है कि मेरे अपने सामाजिक परिवेश की सीमा होने के कारण ऐसा हुआ हो।  मैं कोशिश यही करता हूँ कि इन सरोकारों पर निरन्‍तर विचार करूँ। मेरी रचनाओं में दलित-प्रश्‍नों पर काफी ध्‍यान गया है। मेरी पन्‍द्रह - बीस कविताएँ उन्‍हीं के सरोकारों पर केन्द्रित हैं। स्त्रियाँ मेरे यहाँ शोषिता - प्रताड़िता के रूप में कम आई हैं। लेकिन अन्‍य विविध रूपों में स्त्रियाँ भी मेरी रचनाओं में कई जगह आई हैं। ‘एक प्रेम कविता को पढ़कर’ कविता में स्‍त्री का एक बड़ा ही मार्मिक पक्ष सामने आया है, जिसे देखा जाना चाहिए। ‘नमक’ कविता भी स्‍त्री - पुरुष संबंधों पर केन्द्रित है। मेरी कविताओं में माँ के रूप में अनेक स्त्रियाँ आई हैं, क्‍योंकि मैं माँ को स्‍त्री का आद्य रूप मानता हूँ। मेरी कविताओं में मजदूर स्‍त्री का भी कई जगह चित्रण हुआ है, मसलन 'बबूल के नीचे सोता बच्चा' शीर्षक कविता। स्‍त्री का केवल मध्‍यवर्गीय रूप ही महत्‍वपूर्ण नहीं है। मेरी ‘जो एक स्‍त्री को जानता है’ शीर्षक कविता में स्‍त्री के एक अलग ही प्रकार के मानवीय रूप का चित्रण हुआ है। फिर भी यदि कोई मेरी कविताओं में स्‍त्री विमर्श की कमी का आरोप लगाता है तो मैं उसके बारे में ज्‍यादा कुछ नहीं कह सकता। मैं यही कह सकता हूँ कि मेरी कविताओं में स्त्रियाँ अनेक रुपों में मौजूद हैं। मेरी हाल की एक कविता में तो स्‍त्री का एकदम अलग ही रूप सामने आया है। इसमें एक गाँव में प्रवेश करने पर एक उजाड़ - सा घर दिखाई पड़ता है। उस घर में पहले एक स्‍त्री रहती थी जो सबसे लड़ती थी। वह सबसे लड़ने वाली स्‍त्री अब नहीं है तो घर खाली पड़ा है। ऐसे में कवि यह प्रस्‍तावित करता है कि क्‍यों न उस घर को एक राष्‍ट्रीय स्‍मारक बना दिया जाए, क्‍योंकि यह उस स्‍त्री का घर है जो साहस के साथ मर्दों की दुनिया से लड़ रही थी। इस तरह के स्त्री - विषयक और भी कई प्रसंग हैं मेरी कविताओं में।

उमेश चौहान: आज हमारे सामने वैश्विक स्तर पर भूमंडलीय तापीकरण, जलवायु - परिवर्तन, रेडिएशन, जैविक आपदाओं आदि का गंभीर ख़तरा है। आपने पर्यावरण - संरक्षण के संदर्भ में ‘विद्रोह’ जैसी प्रभावशाली कविता लिखी है। क्या आप आज की हिन्दी - कविता में इन ख़तरों के प्रति समुचित चेतना उभरते देख रहे हैं?

केदारनाथ सिंह: हमने परमाणु - विकिरण के ख़तरे को दूसरे महायुद्ध के समय प्रत्‍यक्ष नहीं देखा। भारत में हमने दूर-दूर से ही उसके बारे में खबरें सुनी थीं। हमारे सामने वह भयावह सच आज भी केवल एक खबर भर है। हम उस त्रासदी के प्रत्‍यक्ष भोक्‍ता नहीं हैं। मैंने एक बड़ी सशक्‍त जापानी कविता इस संदर्भ में पढ़ी थी। उसके अनुवाद का शीर्षक ‘बीसवीं सदी की सबसे बड़ी चीख’ या कुछ ऐसा ही था। उन्‍होंने उस त्रासदी को भोगा था। वह एक दाद देने वाली कविता थी। पर्यावरण की समस्‍या के बारे में लोगों में आज चेतना तो है और इसका एक बड़ा कारण जापान की वह घटना भी है। इस चेतना के पीछे वह ख़तरा भी है जो आज आसन्‍न लगता है। उसे साहित्‍य में महसूस किया जा रहा है। ‘विद्रोह’ कविता में इसी ओर एक इशारा है।

उमेश चौहान: कविता में विचार का होना आप कितना जरूरी मानते हैं? विचार की अभिव्यक्ति को किसी विचारधारा या वाद से जुड़े होने को आप कितना महत्वपूर्ण मानते हैं? समकालीन हिन्दी - कविता में किसी नए वाद के उदय न होने के पीछे आप क्या कारण पाते है?

केदारनाथ सिंह: विचारधारा अलग चीज़ है, विचार अलग। विचारधारा को एक बड़े विचारक ने छद्म - चेतना कहा है। एक गलत विचारधारा के बावजूद कोई रचनाकार एक बड़ी रचना को जन्म दे सकता है, इसके अनेक उदाहरण विश्व - साहित्य में भरे पड़े हैं। विचार भी गलत हो सकता है, लेकिन वह छद्म या धोखा है, ऐसा नहीं हो सकता। विचार तत्‍व कविता की अनिवार्यता है। केवल भाव कविता नहीं बन सकता। कविता के भाव-बोध में विचार भी समाहित होता है। बिना विचार के प्रगाढ़ भाव - बोध पैदा ही नहीं हो सकता। यदि होगा भी तो वह भावुकता में परिवर्तित हो जाएगा। भाव का अर्थ भावुकता नहीं है। भाव में विचार भी शामिल रहता है और ऐन्द्रिय बोध भी। दोनों से मिलकर ही भाव बनता है। इसलिए हमारी परंपरा में तो विचार भाव से अलग है ही नहीं। कालिदास की कविता में उनका विचार भी आता है और ऐन्द्रिय - बोध भी, सब कुछ घुला - मिला है। यही घुला - मिलापन कविता में होना चाहिए। कोरा विचार काफी नहीं है, लेकिन विचारहीन होना भी ठीक नहीं। विचार किसी न किसी रूप में कविता में होना ही चाहिए। कवि की अगर दृष्टि नहीं है, तो वह देखेगा क्या और हस्‍तक्षेप क्‍या करेगा। हर रचना बनी - बनाई व्‍यवस्‍था में एक हस्‍तक्षेप होती है। किसी ने एक नई कविता लिखी, जैसे आपने आल्‍हा लिखा है, तो वह आज की पूरी संवदेनाशीलता के प्रति एक हस्‍तक्षेप है और उसमें बहुत सारे व्‍यंग्‍य भी हैं। हर अच्‍छी रचना एक हस्‍तक्षेप होती है। आप हस्‍तक्षेप कर रहे हैं, लेकिन उस हस्‍तक्षेप की दिशा क्‍या है, आपकी उसमें दृष्टि कौन सी है, वह नुक़्ता कौन सा है जो इशारा कर रहा है हमारी पूरी व्‍यवस्‍था पर, यह सब देखना बहुत ही महत्‍वपूर्ण होता है। जितनी भी हमारे समय की महान कविताएँ लिखी गई हैं, आप उनकी विचारधारा को गलत कह सकते हैं और उनसे टकराने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन आपको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि हर कवि अपने ढंग से सोचता है, अपने विचार रखने की कोशिश करता है। मुक्तिबोध ने भी यही किया। अज्ञेय ने भी किया। आप उनके विचारों को अस्‍वीकार करने के लिए स्‍वतंत्र हैं। सभी रचनाकार अपने ढंग से सोचते हैं। जो स्थिति होती है, वे उसका एक समाधान खोजने का प्रयास करते हैं। कोई नहीं खोज पाता है, कोई खोजने के निकट पहुँच जाता है। मैं विचारधारा या किसी वाद का समर्थन नहीं करता, क्‍योंकि हमारी विचारधाराएँ राजनीतिक संगठनों से जुड़कर रह गई हैं या फिर उस तबके से आई हैं जो या तो प्रतिक्रियावादी हैं या विचारधारा का विरोध करते हैं। विचारधारा का विरोध भी एक विचारधारा है। सभी विचारधाराओं की सीमाएँ होती हैं। उनके पीछे काम करने वाली कई तरह की शक्तियाँ होती हैं, चाहे वे राजनीतिक संगठन हों या दूसरे कोई कारक तत्‍व हों, जो समाज के पीछे या समाज के भीतर काम कर रहे हों। विचारधारा यदि संगठनबद्ध हो तो वह आपको कहीं न कहीं बांधती भी है।  रचनाकार को एक आज़ादी चाहिए। आज़ादी, एक दायित्‍व - बोध के साथ, उच्छ्रंखलता नहीं। उसके भीतर निरन्‍तर एक सामाजिक चेतना सक्रिय रहनी चाहिए। एक ऐसी आज़ादी लेखक के लिए बहुत जरुरी है। वह कई बार संगठन नहीं दे पाते। पार्टियाँ नहीं दे पातीं। इसलिए पार्टी, संगठन, वाद, इन सबसे मुक्‍त होकर चलना ही सृजन की स्वाभाविक राह है।

उमेश चौहान: आज का साहित्य देश में कोई नया जनांदोलन जगाने का काम नहीं कर पा रहा। क्या यह सच है कि आज की कविता जनोन्मुख न होने के कारण समाज की सोच में परिवर्तन लाने का माध्यम नहीं बन पा रही?

केदारनाथ सिंह: यह सच है कि आज देश में कोई जनांदोलन नहीं है। मैं कई बार यह कह चुका हूँ और यहाँ फिर दोहराता हूँ कि आज पूरे परिदृश्‍य में या समाज में नए आंदोलन क्‍यों नहीं पैदा हो रहे इस पर विचार होना चाहिए, विशेषकर समाज में। क्‍योंकि आंदोलन समाज में पहले पैदा होते हैं और साहित्य में बाद में। आज न कोई नया आंदोलन समाज में है, न साहित्‍य में। एक ठहराव की स्थिति है। यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है। आज के विमर्श बस खरोंच लगाते हैं असंगतियों पर, उन्‍हें तोड़ नहीं पा रहे। यह किसी एक वर्ग का नहीं, पूरे समाज का सवाल है और इस पूरी सामाजिक स्थिति के भीतर से अभी ऐसी ताकतें उभरती हुई नहीं दिखाई दे रहीं, समाज में भी नहीं और  साहित्य में भी नहीं, जिनके भीतर से चेतना की नई चिनगारी फूटे और उससे कोई नया आंदोलन आए। आंदोलन आने चाहिए। आंदोलन प्राण देते हैं साहित्‍य को। उसे नई दिशा देते हैं। आज कोई आवागार है ही नहीं, जो आगे बढ़कर चल दे। आवागार चूँकि समाज में नहीं है, इसलिए साहित्‍य में भी नहीं दिखाई पड़ रहा है। एक शून्‍यता है। आंदोलनों को रोकने या थामने में या उनके थोड़ा आगे बढ़ने पर उनकी बांह पकड़कर रोक लेने में इलैक्‍ट्रानिक मीडिया की बड़ी भूमिका है। यह मेरी अपनी समझ है। हमको इससे मुक्‍त होकर सोचना पड़ेगा। इलैक्‍ट्रानिक मीडिया जो राय बना देता है, वही समाज की राय बन जाती है और किसी प्रकार की राय देने की जरुरत ही नहीं रह जाती। इसमें विचार कहाँ है। गुण-दोष पर सोचने के लिए वह अपनी इतनी ज्‍यादा सामग्री लाद देता है समाज पर, कुछ सच और अधिकतर झूठ, कि हम सोचने के लिए स्‍वतंत्र ही नहीं रह जाते। इस बार के चुनाव के दौरान तो यह बड़े पैमाने पर हुआ है। यह तो ठीक है कि वह एक दृश्‍य-श्रव्‍य माध्‍यम है तथा हम उसके जरिए दूर तक पहुँच रहे हैं। कहने के लिए यह भी कहा जा सकता है कि आज हिन्‍दी - कविता पूरे विश्‍व में प्रसारित हो रही है, लेकिन विदेश में बैठा कौन - सा पाठक या अध्‍येता इसको पढ़ रहा है, इसका कोई आकलन हुआ है क्‍या? यह भी एक भ्रम है। इन कविताओं को वहाँ वही  पढ़ेगा जो हिन्‍दीभाषी होगा, अंग्रेज़ी वाला नहीं पढ़ेगा।

उमेश चौहान: हमारा लोकतंत्र एक जटिल दौर से गुजर रहा है, जहाँ लोग एक बड़ा परिवर्तन चाहते हैं लेकिन उनकी सोच को समुचित नेतृत्व नहीं मिल पा रहा। आप इसे किस दिशा में जाता देख रहे हैं?


केदारनाथ सिंह: यह निश्चित ही चिन्‍ता का विषय है कि आज देश में कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं उठ रहा? हमारा समाज एक करवट लेता हुआ क्‍यों नहीं दिखाई पड़ रहा? हम केवल चुनाव तक ही सीमित होकर क्‍यों रह गए हैं? इस ढीले-ढाले जनतंत्र का क्‍या होगा, जो अपनी सारी शक्ति अंतत: तथाकथित चुनाव से ही अर्जित करता है? मैं चुनाव का विरोध नहीं कर रहा हूँ, किन्‍तु संकट यही है कि वह पूरी तरह से जनता के विचारों को प्रतिबिम्बित नहीं कर पाता है। उसका जो भी परिणाम आता है, वह कैसे आता है, यह सभी लोग जानते हैं। उसके पीछे कई तरह के तत्‍व काम करते हैं। हमारा समाज, धर्मों, जातियों, वर्गों में बंटा हुआ समाज है। इसलिए मैं समझता हूँ कि मनुष्‍य को स्‍वतंत्र रुप से सोचने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हमें बनानी पड़ेगी। ऐसी परिस्थितियाँ बनाने में बुद्धिजीवी वर्ग का बहुत बड़ा हाथ हो सकता है। इसमें कवि, लेखक, कलाकार एक अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं। यह बड़े पैमाने पर होना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है।  मैं अग्रिम दस्‍ते में नहीं हूँ। उसमें हो भी नहीं सकता। मैं बीते हुए समय का आदमी हूँ। लेकिन एक बीते हुए समय के आदमी की तरह आने वाले समय की एक धमक सुनना चाहता हूँ। उसे कितना सुन पाता हूँ, यह अलग बात है। लेकिन अभी तक ऐसा होता मुझे दिखाई नहीं पड़ रहा है। कई बार मुझे लगता है कि नक्‍सलवादी जो कर रहे हैं, वह भले त्‍याज्‍य हो, लेकिन वे सोचने के लिए मजबूर तो कर रहे हैं। वे झटका दे रहे हैं कि सोचो, विचार करो इस पर। तरीका गलत है उनका, लेकिन वे झटका तो दे ही रहे हैं। मुझे लगता है कि वह समय जल्द ही आएगा जब देश की जनभावना एक बड़े परिवर्तनकारी आंदोलन का स्वरूप ले लेगी।

'मेरे साक्षात्कार' की काव्य - दृष्टि (केदारनाथ सिंह)

(केदारनाथ सिंह की बेटी रचना सिंह के अथक परिश्रम से उनके पहले के विभिन्न साक्षात्कारों का एक संग्रह 'मेरे साक्षात्कार' शीर्षक से किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली से वर्ष 2008 में छपा। मैंने इस पुस्तक में शामिल केदारनाथ सिंह के साक्षात्कारों में से उनकी काव्य - दृष्टि के कुछ तत्व छांटने का एक प्रयास किया है, जो यहाँ प्रस्तुत है।)

कविता की अवधारणा

कविता के बारे में सामान्य धारणा है कि कविता प्रकृति में यथार्थ - विरोधी होती है। इसलिए कविता से यह माँग होती है कि वह यथार्थ से मुठभेड़ करे, उसका साक्षात्कार करे। …… (वास्तव में) कविता अपने तत्व यथार्थ से ही लेती है। वह दोहरे स्तर पर यथार्थ से जुड़ती है। वह अभिव्यक्ति का उपकरण भी यथार्थ से ही लेती है और यथार्थ को ही व्यक्त भी करती है। यहाँ से दो बातें निकलती हैं कि कविता यथार्थ के बिना जीवित नहीं रह सकती और दूसरी ओर यथार्थवाद के अलावा वह एक ख़ास तरह की विचार - परंपरा से भी जुड़ी होती है। (अनिल जनविजय व भारत यायावर द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आग और रोटी का रिश्ता' से)

समाज और यथार्थ, और वह सब कुछ जो जीवन और जगत में है, कविता में आना चाहिए, लेकिन कविता की शर्तों को भूले बिना। मेरा ख़्याल है कि एक रचनाकार को कविता के अपने मोर्चे पर खड़े होकर वहीं से अपनी लड़ाई लड़नी चाहिए। (दुर्गाप्रसाद गुप्ता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'भारतीय कविता को संश्लिष्ट कविता होना चाहिए' से)

कविता की रचना - प्रक्रिया

रचना का कहीं न कहीं एक ख़ास तरह की रचनात्मक मुक्ति से गहरा संबन्ध होता है और उसी मुक्ति में मेरा विश्वास है। (अनिल जनविजय व भारत यायावर द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आग और रोटी का रिश्ता' से)

काव्य - प्रक्रिया एक ऐसा विषय है जो अवचेतन मन में प्रवेश करने की अपेक्षा रखता है। एक बार जब कविता आकार प्राप्त कर लेती है तो इसकी सृजन - प्रक्रिया के बारे में दावे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता। …… आधुनिक कवि के लिए काव्य - प्रक्रिया, जीवन - प्रक्रिया से बहुत अलग नहीं होती। न जाने कैसे जीवन - प्रक्रिया ही काव्य - प्रक्रिया में रूपांतरित हो जाती है। (ई.बी. रामकृष्णन द्वारा किए गए साक्षात्कार 'जैसे पुल नाव का विस्तार है' से)

मैंने कविता से अपने रिश्ते को किसी हद तक पुष्ट किया। यत्नपूर्वक किया। कविता से यह रिश्ता अनायास नहीं हुआ। कविता की एक समझ इसी प्रकार बनी। अपने ‘मॉडल’ भी चुने। शुरू के ‘मॉडल’ बीच में बदले। इसके कारण कई बदलाव आए हैं। यह एक कवि की विकास - प्रक्रिया है। (अभिज्ञात द्वारा किए गए साक्षात्कार 'समकालीन कविता के बीच व्यापक पारिवारिक समानता है' से)

कविता की निर्माण - प्रक्रिया को लेकर कोई सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता। यह छोटी और लम्बी दोनों प्रकार की कविताओं पर लागू होता है। हाँ, लम्बी कविताओं में यदि कथावस्तु हुई तो उसका दबाव अलग ढंग से काम करता है और कई बार कविता उस दबाव से आगे बढ़ती है। (आशा मेहता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'अध्यात्म केवल आत्मतत्व का चिन्तन नहीं है' से)

कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है। वह सिर्फ़ बीच की खाली जगह को भरता है। इस भरने की प्रक्रिया में ही रचना की संभावना छिपी हुई है। (मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘लिखना चुप रहने के विरुद्ध एक निरन्तर लड़ाई है’ से)

कविता का भाषा एवं शब्द से अन्तर्संबन्ध

कविता की बुनियाद भाषा में है। कविता में भाषा बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। कई बार हम उसके लिए सचेत नहीं होते हैं। यह भाषा अर्जित करनी पड़ती है। (अभिज्ञात द्वारा किए गए साक्षात्कार 'समकालीन कविता के बीच व्यापक पारिवारिक समानता है' से)

विचार, अनुभूति और संवेदना - सबका संबन्ध शब्द से होता है और कविता शब्द है। शब्द - जो कवि के लिए सबसे रहस्यमय वस्तु है। शब्द के माध्यम से ही कविता घटित होती है, जो अपने आप में एक समग्र इकाई होता है। …… शब्दबद्ध रचना की आकृति कवि के लिए रहस्यमय है। कवि शब्दों से उलझकर उन्हें खोलना चाहता है। वह शब्दों से जूझता है। यही उसका कविता से लगाव है। कविता का विलक्षण रचनातंत्र है। जीवन का जितना रूपायन कविता करती है, उतना अन्य कोई विधा नहीं कर पाती। कवि इसी रूप में कविता से जुड़ता है। …… भाषा के स्वरूप में कविता एक बड़ा चेंज़ लाती है। कविता का तंत्र बहुत जटिल होता है। इस चेंज़ को समझाने के लिए कवि को आगे आना पड़ता है। …… कविता जिस तरह भाषा को विकसित करती है, उसमें यह निहित है कि कवि आगे आकर समझाए। कविता का ढाँचा लचीला होता है। एक्स्पेरिमेन्ट सबसे ज्यादा और जल्दी कविता में ही होते हैं। कविता में क्यों इतने आंदोलन हैं? क्योंकि हर आंदोलन की अपनी व्याख्या है। जितने आंदोलन कविता में हुए हैं उतनी ही ज़्यादा बार कवि को सामने आना पड़ा है। यह विलक्षण फिनोमिना है जो कविता के विकास से जुड़ा हुआ है। (अनिल जनविजय व भारत यायावर द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आग और रोटी का रिश्ता' से)

शब्द से पहले कविता नहीं है और शब्द में जो उतरकर आता है वह जरूरी नहीं कि हमारे मनोवेग का हिस्सा हो। भाषा केवल माध्यम नहीं है और सजावट की वस्तु तो बिल्कुल नहीं, इसलिए पूरी प्रक्रिया में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भाषा बाहर यानी समाज की ओर से आती है, जिसे हम अपने साँचे में ढालने की कोशिश करते हैं। जब भाषा आती है तो बहुत कुछ लेकर आती है और जो चीज़ लेकर आती है उसका उस समुदाय से गहरा रिश्ता होता है जिसके द्वारा वह ली जाती है - आख़िर भाषा स्मृतियों का पुंज है और विलक्षण यह है कि स्मृतियाँ पुरानी और एकदम ताज़ा भाषा में घुली - मिली होती हैं। इसलिए मुझे लगता है कि किसी रचना की प्रक्रिया की पड़ताल वस्तुत: वह जिस तरह से भाषा में ढली है, उसकी पड़ताल है। (हेमलता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'मेरे लिए मेरा गाँव स्मृतियों का महाकोश है' से)

भाषा के भीतर कविता की भाषा की अतिगामी प्रकृति कविता की भाषा को ज्ञान की भाषा से अलग करती है और इस प्रक्रिया के द्वारा वह स्वयं भाषा का माध्यम मात्र न रहकर सृजन का सक्रिय साझेदार बन जाती है। भाषा को यह सामर्थ्य एक ओर रचनाकार की सृजन - क्षमता से मिलती है, दूसरी ओर स्वयं उस भाषा को बोलने वालों की एक लंबी जमात जो हमेशा भाषा की पृष्ठभूमि में होती है, उससे भी मिलती रहती है। इसलिए भाषा यह सर्जनशीलता एक द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया के भीतर अर्जित करती है - यानी एक ओर रचनाकार, दूसरी ओर भाषा और उसका वक्ता समाज। (सदानन्द शाही द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘समकालीन हिन्दी कविता के सामने मुद्रित पाठ को उच्चरित पाठ में बदलने की चुनौती है’ से)

कविता एक ऐसी चीज़ है जिसका अपनी चली आई परंपरा के सूत्रों से इतना गहरा रिश्ता है कि उसके बिना कविता संभव ही नहीं है, क्योंकि हम शब्द से कविता लिखते हैं और शब्द हमारी बनाई हुई चीज़ नहीं है। हम शब्द को परंपरा से प्राप्त करते हैं। कविता की भाषा हमारी बनाई हुई नहीं है। वह परंपरा से चली आ रही है। हम सिर्फ़ उसे अपने युग के जीवंत भाषिक संदर्भ से जोड़ देते हैं और इस तरह से उसे नया संस्कार देते हैं। …… कविता पुराने शब्दों को छोड़ती नहीं है। शब्द के बारे में मेरा मानना है कि जो शब्द जितना पुराना, वह शब्द उतना ही अर्थवान होता है। जो शब्द जितने लम्बे समय से लोक - व्यवहार में रहता है, उस पर उतनी ही ज़्यादा मानवीय जीवन की ऐतिहासिक छाप पड़ती चली जाती है। हमारी पुरानी स्मृति में पड़े हुए शब्द हमारी कई स्मृतियों को एक साथ जगाते हैं। (मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘लिखना चुप रहने के विरुद्ध एक निरन्तर लड़ाई है’ से)

शब्द अपनी परंपरा से एक चेतना - संदर्भ लेकर आते हैं। श्रेष्ठ कविताओं में परंपरा के गतिशील आयाम होते हैं। आज जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, वहाँ संकट दिखता है। लगता है, कोरी स्लेट पर लिखी जा रही हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण रिक्तता है। ऐसी कविताएँ ज़िन्दा नहीं रहतीं। …… कविता में शब्दबद्ध कला दो स्तरों पर दिखनी चाहिए। एक तो कवि की जो वेदना है, उसकी गहराई, सच्चाई व तीव्रता किस हद तक है। वह पर्याप्त न हो तो अच्छी कविता नहीं बनेगी। भाषा के विशिष्ट प्रयोग में संवेदना की तीव्रता जितनी मुखर होगी, वह खिल उठेगी। दोनों में अटूट संबन्ध होना चाहिए। शब्द और अर्थ का घनिष्ठ संबन्ध होना चाहिए। तभी वे एकाकार होंगे। दोनों में भेद नहीं होने से ही संसार की सारी बड़ी कविताएँ संश्लिष्ट रूप में सामने आती हैं। भाषा के विशिष्ट प्रयोग पर ग़ौर करना चाहिए। अच्छी कविता बीच - बीच में अपने विशिष्ट प्रयोगों से, उपमा से, रूपक से रोकती है, टोकती है। …… इसीलिए उसमें जल्दीबाज़ी नहीं होनी चाहिए। कविता पढ़ना सौ मीटर की दौड़ नहीं। कविता अच्छी तभी होगी जब वह सरपट न दौड़ाए। बाधा दे, रोके। (कृपाशंकर चौबे द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘कविता पढ़ना सौ मीटर की दौड़ नहीं’ से)

मुझे ग़लत भाषा बहुत आकृष्ट करती है। अजब बात है, क्योंकि जीवंतता उसी में होती है और लगातार चुनौती के रूप में वहाँ रहती है। और मैं इधर मानने लगा हूँ कि जो भाषा ग़लत लिखने और बोलने की जितनी छूट देती है अपने समाज में, वह उतनी ही ज़िन्दा रहती है। (सुधीश पचौरी द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘पाणिनि से झगड़ा है’ से)

कविता में बिम्ब

कविता यदि सम्मूर्तन है तो वह बिंब के बिना संभव नहीं है। इसलिए बिंब तो कविता में किसी न किसी रूप में रहता ही है। …… कविता बिंब - बहुल नहीं होती - बिंबमय या बिंबात्मक होती है और जहाँ बिंबों का समुच्चय मात्र होगा, वहाँ कविता कमज़ोर होगी और उसका मूल आशय ग़ायब हो जाएगा। (दुर्गाप्रसाद गुप्ता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'भारतीय कविता को संश्लिष्ट कविता होना चाहिए' से)

बिना बिंब के कविता में काम नहीं चलता है और हर युग की कविता में बिंब के प्रयोग का चलन रहा है। सवाल बिंबों के नियोजन का है। आप कैसे उनका प्रयोग करते हैं? उनकी भूमिका कितनी गौण या प्रमुख है? बिंबों के परस्पर संबन्धों का रूप क्या है? है भी या नहीं? कितना गैप रह गया है? कविता जो कहना चाहती है, उसको बिंब कहाँ तक संकेतित कर पाते हैं? ये सारी बातें महत्वपूर्ण होती हैं। …… कविता में बिंब हों, यह तो ठीक है, लेकिन कविता बिंब - बहुल न हो, बिंब से बोझिल न हो। उससे बचना चाहिए। बिंब - बहुल कविता अपने आशय को क्षतिग्रस्त करती है। बिंब का चयन बहुत सतर्क एवं सावधान प्रक्रिया है और उसमें न्यूनतम बिंब - प्रक्रिया से काम लेने तक अपने को सीमित रखना चाहिए। बिंब - मोह नहीं होना चाहिए। बिंब - नियोजन की प्रक्रिया में कवि को निर्मम होना चाहिए। (मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘लिखना चुप रहने के विरुद्ध एक निरन्तर लड़ाई है’ से)

कविता को इस प्रकार रूपायित किया जाना चाहिए कि उसमें बिंब के अस्तित्व का अलग से बोध न हो, बल्कि वह पूरी रचना - प्रक्रिया में इस प्रकार घुल - मिल जाए कि उसकी अंतर्दैहिक इकाई का अविच्छिन्न हिस्सा बन जाए। यानी कविता में बिंब की घुलावट महत्वपूर्ण है, बिंब की प्रमुखता नहीं। (आशा मेहता द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘अध्यात्म केवक आत्मतत्व का चिंतन नहीं है' से)

कविता का लय और छंद से संबन्ध

हिन्दी कविता में, रूप के स्तर पर छंद या लय से हटकर गद्यवृत्त के भीतर पूरे काव्य - विस्तार का सिमट जाना कई बार मेरे जैसे व्यक्ति को थोड़ा परेशान करता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिस पर आने वाले समय में गहराई से विचार करने की जरूरत होगी। (देवेन्द्र चौबे द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘आज़ादी के बाद का समाज और साहित्य' से)

छंद का प्रश्न विचारणीय है। यह एक तथ्य है कि आज लगभग सारी समकालीन कविता गद्य की लय में लिखी जाती है। या कहें कि गद्य के भीतर की लय के विविध आयामों को तलाशते हुए लिखी जा रही है। …… हिंदी कविता के छंद की परम्परा संस्कृत के परम्परागत छंदों से लोक के मुक्त प्रवाही छंदों तक फैली हुई है। …… इतनी बड़ी समृद्ध परम्परा से आँख मूँदकर चलना अपने को लगातार एक घाटे की स्थिति में रखना है। यहाँ मैं इतना जोड़ना चाहूँगा कि किसी भी भारतीय भाषा में छंद को इस तरह नहीं छोड़ा गया है जिस तरह हिंदी कविता में छोड़ा गया है। मुझे लगता है, नई शताब्दी में प्रवेश करते हुए कविता को जिन मूलभूत समस्याओं से दो - चार होना पड़ेगा, उनमें यह छंद की समस्या भी एक है। (सदानन्द शाही द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘समकालीन हिन्दी कविता के सामने मुद्रित पाठ को उच्चरित पाठ में बदलने की चुनौती है’ से)

गीत की जन्मभूमि लोकगीत है, आदर्श भी लोकगीत है। गीत को हमेशा अपनी ताक़त अर्जित करने के लिए वहीं जाना पड़ेगा। छायावादियों ने गीतों को लोक - परम्परा से दूर ले जाने का ख़तरा उठाया था। निराला पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इसे महसूस किया और बाद में अपने गीतों को दूसरे स्तर पर विकसित किया। (धर्मेन्द्र त्रिपाठी द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आज बुद्धिजीवी वर्ग अप्रासंगिक होता जा रहा है' से)

कविता में विचार एवं विचारधारा

विचार और भाव के बीच जैसा पार्थक्य हम करते हैं, वैसा होता नहीं है। कोई भाव विचार - शून्य नहीं होता, भाव में विचार निहित है क्योंकि भाव तो सभ्यता और संस्कृति की प्रक्रिया से निकलकर आए हुए मनुष्य का बोध है। …… जहाँ विचारधारा सतह पर तैरती हुई दिखाई पड़ती है, वहाँ साहित्य कमज़ोर पड़ जाता है। उदाहरण के लिए मैं कहूँ तो तुलसीदास का ‘उत्तरकांड’ सबसे कमज़ोर है और इसलिए कमज़ोर है कि वहाँ विचारधारा सतह पर तैरती हुई दिखाई पड़ती है। लेकिन जहाँ वह संवेदना का हिस्सा है, वहाँ एक बड़ी रचना पैदा होती है। (धर्मेन्द्र त्रिपाठी द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आज बुद्धिजीवी वर्ग अप्रासंगिक होता जा रहा है' से)

यदि आपका कोई नैतिक संदेश है तो कविता में उसे अन्तर्निहित होना चाहिए, मुखर नहीं। मैं अनुभूति से विचार की ओर अग्रसर होता हूँ, जिनके बीच एक द्वंद्वात्मक संबन्ध होता है। पर मैं कविता को कभी अवधारणाबद्ध नहीं करता। (ई.बी. रामकृष्णन द्वारा किए गए साक्षात्कार 'जैसे पुल नाव का विस्तार है' से)

कविता के पास अपना विचार होना चाहिए और जीवन - जगत के बारे में उसका विचार जितना ही गहरा और पुख़्ता होगा, उसकी रचना उतनी ही मजबूत होगी, इसमें मुझे कोई संशय नहीं। परन्तु विचारधारा एक अलग चीज़ है और विचारधारा के साथ दूसरी बहुत सारी चीज़ें जुड़ी होती है, यानी कई बार उसके संगठन भी जुड़े होते हैं। (दुर्गाप्रसाद गुप्ता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'भारतीय कविता को संश्लिष्ट कविता होना चाहिए' से)

प्रतिबद्धता एक रचनाकार की अगर होती है तो वह उस मनुष्य के प्रति ही होती है जिसको सामने रखकर वह रचना करता है। कविता विचारहीन नहीं हो सकती, परन्तु विचारात्मक प्रतिबद्धता को मैं कविता के लिए अनिवार्य नहीं मानता। रचनाकार का वैचारिक धरातल ज़्यादा खुला हुआ होना चाहिए। खुलापन एक तरह की मुक्ति है और रचना का इस मुक्ति से बहुत गहरा रिश्ता है। (हेमलता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'मेरे लिए मेरा गाँव स्मृतियों का महाकोश है' से)

कविता के लिए मनुष्य की पक्षधरता के अतिरिक्त मैं किसी अन्य पक्षधरता को आवश्यक नहीं मानता। मनुष्य में भी अमूर्त मानव नहीं, बल्कि जीता - जागता, ठोस, दुखी, संतप्त, वंचित मानव जो हमारे देश का बहुसंख्यक मानव है। पक्षधरता का एक दूसरा धरातल स्वयं शब्दकर्म हो सकता है, जिसकी अपनी कुछ बुनियादी शर्तें होती हैं, जिन्हें दृष्टि से ओझल कर देने के बाद न तो कविता कविता रह जाती है और न ही उसका सर्जक सर्जक। (सदानन्द शाही द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘समकालीन हिन्दी कविता के सामने मुद्रित पाठ को उच्चरित पाठ में बदलने की चुनौती है’ से)

वैचारिक प्रतिबद्धता रचनाकार की बड़ी रचना के लिए जरूरी है। वैचारिक प्रतिबद्धता किसी किसी बाहरी सत्ता के प्रति नहीं होनी चाहिए। यदि है तो वह प्रतिबद्धता रचना को क्षतिग्रस्त कर देगी। बुनियादी तौर पर यह प्रतिबद्धता मानव - भविष्य के प्रति होनी चाहिए। दल की प्रतिबद्धता को मैं हितकर नहीं मानता। (कृपाशंकर चौबे द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘कविता पढ़ना सौ मीटर की दौड़ नहीं’ से)

कविता के सरोकार एवं नए विमर्श

विषम से विषम परिस्थिति में भी व्यवस्था की असाधारणता के भीतर कविता कहीं न कहीं अपना रास्ता निकाल लेती है। हाँ मैं यह जरूर मानता हूँ कि कविता से अतिरिक्त मांग नहीं की जानी चाहिए। कविता क्रांति ले आएगी, ऐसी ख़ुशफ़हमी मैंने कभी नहीं पाली, क्योंकि क्रांति एक संगठित प्रयास का परिणाम होती है, जो कविता के दायरे के बाहर की चीज़ है। इसलिए बेहतर होगा कि हम कविता से वही मांग करें, जो वह दे सकती है। मेरी मान्यता है, एक अच्छी कविता क्रांति के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने में सैकड़ों राजनीतिक प्रस्तावों से कहीं ज़्यादा काम करती है और कविता यही कर सकती है। जो लोग उससे सीधे क्रांति या युद्ध में शिरकत की अपेक्षा रखते हैं, वे कविता की मूल प्रकृति को ही नहीं समझते हैं। (विनोद दास द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘कविता क्रांति लाएगी, ऐसी ख़ुशफ़हमी मैंने कभी नहीं पाली’ से)

गहरी और प्रखर राजनीतिक चेतना के बिना कविता नहीं लिखी जा सकती। …… किसी राजनीतिक दल में रहकर भी अच्छी रचना लिखी जा सकती है, पर महत्वपूर्ण यह है कि कविता के लिए कवि कितना संपृक्त हो पाता है, कितना श्रम करता है। …… राजनीति के दलगत ढाँचे की अपनी शर्तें होती हैं और कविता प्रकृति से ही मुक्त होती है। (अनिल जनविजय व भारत यायावर द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आग और रोटी का रिश्ता' से)

सारे नहीं तो हिन्दी के ज़्यादातर आधुनिक लेखन में विस्थापन की पीड़ा किसी न किसी रूप में ध्वनित होती है, क्योंकि उसमें ज़्यादातर वे लोग हैं, जो गाँव से आए हैं। वे शहर के बन पाते हैं या नहीं बन पाते हैं, लेकिन शहर में अपने आपको एडजस्ट करने में एक बड़ी लड़ाई लड़ते हैं। उस लड़ाई में बहुत कुछ खोते हैं। एक ख़ास तरह का मध्यमवर्ग शहर में विकसित होता रहा है, जो गाँवों से आया है। आधुनिक हिन्दी साहित्य उन्हीं लोगों का साहित्य है। (मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘लिखना चुप रहने के विरुद्ध एक निरन्तर लड़ाई है’ से)

हिन्दी की मुख्य रचनात्मक धारा शुरू से ही ग्रामोन्मुखी रही है। हिन्दी की यह ग्रामोन्मुखता एक प्रमुख कारण थी, जिसके चलते ही खड़ी बोली के दो हिस्से हो गए। वह हिस्सा जो ग्रामोन्मुख था, हिन्दी कहलाया और जो शहर - केन्द्रित था, उसे उर्दू कहा गया। दुनिया की किसी भी भाषा में इस तरह का बँटवारा नहीं हुआ है। अज्ञेय से पहले हिन्दी का कोई ऐसा कवि नहीं हुआ जो शुद्ध रूप से नागरिक कवि हो। (वीरेशचंद्र द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘गाँव की दुनिया से कविता का रिश्ता’ से)

कविता और बाज़ार

आज हर भाषा की एक बड़ी परीक्षा यह है कि वह बाज़ार की व्यवस्था का सामना कैसे करती है और मेरा ख़्याल है कि हमारी हिन्दी भाषा एक नए विज्ञान की भाषा के रूप में ढल रही है। यह उसके लचीलेपन का प्रमाण है कि वह यहाँ भी अपनी सार्थकता प्रमाणित करने की स्थिति में है। इसके कुछ दुष्परिणाम भी हैं। इससे भाषा में कुछ दूसरे प्रकार की विकृतियों के आने का ख़तरा भी है, लेकिन फिर भी मैं मानता हूँकि जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, उसमें प्रत्येक भाषा को इन स्थितियों से गुजरे बिना आगे का रास्ता मिलेगा नहीं। (धर्मेन्द्र त्रिपाठी द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आज बुद्धिजीवी वर्ग अप्रासंगिक होता जा रहा है' से)

मैं ऐसा नहीं मानता कि विश्व - बाज़ार कविता को निगल जाएगा और कविता हमेशा के लिए अपना प्रभाव खो देगी। मैं मानता हूँ कि कविता के लिए समाज की हर गतिविधि एक कच्चे माल की तरह होती है। विश्व - बाज़ार विश्व - समाज की नई गतिविधि है और उसमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिससे नए ढंग की कविता जन्म ले। कविता अपनी प्रकृति से ही हर स्थिति का सामना करती है। वह उसे तोड़ती - फोड़ती है, जिससे नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं। यह उसके वजूद की निशानी है। (रवीन्द्र त्रिपाठी द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘बाज़ार कविता को निगल नहीं सकता’ से)

बाज़ार चाहे भी तो भाषा के बिना ज़िन्दा नहीं रह सकता जबकि भाषा की प्रकृति में वह अन्तर्निहित शक्ति होती है कि वह बाज़ार के साथ भी ज़िन्दा रहे और बाज़ार के बिना भी ज़िन्दा रह सके। (अजित राय द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘विज्ञापन की भाषा कविता के लिए चुनौती है’ से)

उपभोक्ता समाज को टी वी, रेडियो, कॉस्मेटिक्स और संचार के आधुनिक साधन चाहिए। कविता सबसे बाद में चाहिए, या फिर नहीं चाहिए। ऐसा एक समाज हमने बनाया है। जैसा समाज हम बनाएँगे, उसी के अनुसार कला और साहित्य की क़ीमत तय होगी। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। (अभिज्ञात द्वारा किए गए साक्षात्कार 'समकालीन कविता के बीच व्यापक पारिवारिक समानता है' से)

उपभोक्ता - संस्कृति में कविता बेकार की चीज़ समझी जाने लगी है। मनोरंजन के अन्य साधन मनुष्य की स्वाद - वृत्ति को बहुत आसानी से संतुष्ट कर सकते हैं। कविता के आनन्द तक पहुँचने में समय लगता है। संक्षिप्त मार्ग से चलकर उस आनन्द को पाया नहीं जा सकता। उपभोक्ता - संस्कृति के लोगों के पास समय कम है। …… अत: जब तक समाज के ढाँचे में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक कविता को यह नियति झेलनी पड़ेगी। (मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘लिखना चुप रहने के विरुद्ध एक निरन्तर लड़ाई है’ से)

भाषा - नीति

भाषा - नीति के बारे में एक बात मुझे हमेशा लगती है कि हम हिन्दी की बात में थोड़ी शक्ति तभी पैदा कर सकेंगे, जब सिर्फ़ हिन्दी की बात न करें - भारतीय भाषाओं की बात करें। अंग्रेज़ी से अकेले हिंदी नहीं लड़ेगी, अंग्रेज़ी से सारी भारतीय भाषाएँ मिलकर लड़ेंगीं। …… भारत की सारी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ हैं। हिन्दी ही सिर्फ़ राष्ट्रभाषा है, यह मानना भी एक खंडित सत्य होगा। संपर्क भाषा के रूप में का एक अलग महत्व है और शेष भाषाओं से उसकी स्थिति भिन्न है, लेकिन जहाँ तक राष्ट्रभाषा का सवाल है, यदि हम यह मान लें कि सिर्फ़ हिन्दी ही राष्ट्रभाषा है तो ध्वनि यह निकलती है कि बाकी भाषाएँ इस राष्ट्र की भाषाएँ नहीं हैं। (दुर्गाप्रसाद गुप्ता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'भारतीय कविता को संश्लिष्ट कविता होना चाहिए' से)


साहित्य और मीडिया

मीडिया का डर एक व्यर्थ का डर है। यह अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है और अब ज़रा उसका प्रसार बढ़ा है। वह साहित्य के लिए एक जोख़िम है, ऐसा नहीं मानता मैं। साहित्य और कला की सबसे बड़ी ताक़त यह होती है कि वह हर एक चीज़ को अपनी खाद बना लेता है। अत: आज मीडिया को भी विषय बनाकर साहित्य लिखा जा सकता है और ऐसे लोग भी हैं, जो इसके माध्यम से पनप रही अपसंस्कृति को खाद बनाकर बड़ा साहित्य रच सकते हैं। साहित्य की यह ताक़त कि वह हर चीज़ को खाद में बदल ले, बड़ी ताक़त है। मीडिया को भी इस रूप में पचाने की ताक़त साहित्य रखता है, कला रखती है, ऐसा मेरा विश्वास है। (धर्मेन्द्र त्रिपाठी द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आज बुद्धिजीवी वर्ग अप्रासंगिक होता जा रहा है' से)

आज की कविता

आज के नए कवि व्यापक जनवादी मूल्यों से जुड़े हैं, जो अपने लिए कविता का नया ढाँचा, नए मूल्य और नई भाषा खोज रहे हैं। आज की कविता व्यापक स्तर पर मानवीय संबन्धों से जुड़ी है, इसमें सिर्फ़ निजता की खोज नहीं है। (अनिल जनविजय व भारत यायावर द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आग और रोटी का रिश्ता' से)

आज की कविता एक ख़ास तरह के विशेषीकरण की दिशा में बढ़ती चली गई है। वो अनुभव का विशेषीकरण हो या टेक्नीक का विशेषीकरण हो। सारे समाज में जब विशेषीकरण हो रहा हो तो कविता इससे वंचित नहीं रह सकती। लेकिन जरूरत इस बात की है कि अपनी सारी विशिष्टताओं के साथ वह बार - बार समाज के अधिकाधिक वर्गों के सामने आए। वे न समझें, तब भी आए। उपेक्षा करें, तब भी आए। विश्वास है, कि दस - बीस आने पर एक ख़ास तरह का प्रशिक्षण उस वर्ग के लोगों के कानों का, आँखों का होगा। …… तब शायद वह कविता को किसी हद तक ग्रहण करने की स्थिति में होगा। (अभिज्ञात द्वारा किए गए साक्षात्कार 'समकालीन कविता के बीच व्यापक पारिवारिक समानता है' से)

मुद्रित पाठ को उच्चरित पाठ में बदलने की चुनौती आज के कवि को स्वीकार करनी चाहिए और न समझे जाने का ख़तरा उठाकर भी बड़े समुदाय तक अपनी बात को पहुँचाने की कोशिश करनी चाहिए। (सदानन्द शाही द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘समकालीन हिन्दी कविता के सामने मुद्रित पाठ को उच्चरित पाठ में बदलने की चुनौती है’ से)

यह सच है कि हिन्दी समाज में कविता लगभग हाशिये पर है। ऐसा कहते हुए पीड़ा भी होती है कि आज की हिन्दी कविता उस हद तक भी समाज की जरूरत एवं उसकी अभिरुचि का हिस्सा नहीं बन सकी, जिस हद तक छायावादी कविता बन सकी थी। इसका बड़ा कारण यह है कि कविता में एक ख़ास तरह का विशेषीकरण उसके ढाँचे, अंतर्वस्तु और रचना - प्रक्रिया में आ गया है। आज की कविता शुद्ध रूप से पाठ्य कविता बन गई है जबकि उसकी प्रकृति में ही निहित है कि वह जितनी पाठ्य उतनी ही श्रव्य होगी। कविता को लगातार ज़िन्दा रहने के लिए समाज की आँख एवं कान दोनों का विषय बनना चाहिए। (अजित राय द्वारा किए गए साक्षात्कार ‘विज्ञापन की भाषा कविता के लिए चुनौती है’ से)


शब्द व कविता का भविष्य

मैं शब्द के अस्तित्व को लेकर चिन्तित नहीं हूँ क्योंकि उसकी उच्चरित शक्ति में मुझे विश्वास है, पर यह ख़तरा ज़रूर देखता हूँ कि लिखित शब्द की पहुँच का दायरा कम हुआ है यानी साहित्य का पाठक वर्ग सिकुड़ा है। कुछ लोकप्रिय साहित्य - रूपों को छोड़ दें तो गंभीर साहित्य की स्थिति लगभग यही है। …… जैसे - जैसे समाज के समग्र विकास की अवधारणा और उससे जुड़ी हुई प्रक्रिया बलवती होती जाएगी, वैसे - वैसे 'शब्द' अपने श्रोता के और निकट होता जाएगा। पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामाजिक परिवर्तन की कारक शक्तियाँ आगे कौन - सी दिशा लेती हैं और इसके भीतर के विधेयात्मक तत्व कितने प्रभावशाली सिद्ध होते हैं।  (देवेन्द्र चौबे द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आज़ादी के बाद का समाज और साहित्य' से)

अभिव्यक्ति के सारे माध्यम जहाँ निरस्त या समाप्त हो जाते हैं, शब्द वहाँ भी जीवित रहता है। मुझे मानवीय शब्द की गरिमा में विश्वास है। आज भारतीय लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह शब्दों की दुनिया में अपने ठेठ भारतीय शब्द की विलक्षण पहचान को कैसे बनाए रखे। (देवेन्द्र चौबे द्वारा किए गए साक्षात्कार 'आम आदमी मेरे लिए कोई अमूर्त धारणा नहीं है' से)

कविता चली जाती है या चली जाएगी, यह सोचना ही गलत है। कविता रहती है और वह लगभग पत्थर पर उगने वाली घास की तरह होती है जो पत्थर को तोड़कर भी उग आती है, इसलिए वह रहेगी ही। (दुर्गाप्रसाद गुप्ता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'भारतीय कविता को संश्लिष्ट कविता होना चाहिए' से)


कविता के भविष्य के प्रति मैं आज भी निराश नहीं हूँ। यह मानना कि कविता नष्ट हो जाएगी, एक प्रकार का ‘अप - डर’ है। …… कविता केवल उसी दिन निरस्त हो सकती है, जिस दिन किसी विस्फोटक से मानव - मन से भाषा को उड़ा दिया जाएगा। भाषा का होना कविता के होने की गारंटी है। (हेमलता द्वारा किए गए साक्षात्कार 'मेरे लिए मेरा गाँव स्मृतियों का महाकोश है' से)